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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 15 सितंबर 2013

कमलेश भट्ट 'कमल'

परिचय: 
जन्म: 13 फ़रवरी 1959 को सुल्तानपुर(उ॰प्र॰)की कादीपुर तहसील के ज़फरपुर नामक गाँव में।
कुछ प्रमुख कृतियाँ-त्रिवेणी एक्सप्रेस, चिट्ठी आई है, शंख सीपी रेत पानी, मैं नदी की सोचता हूँ (ग़ज़ल संग्रह), साक्षात्कार, संपादन-हाइकु-1989, हाइकु-1999, हाइकु-2009, अमलतास-2009 (हाइकु संग्रह)
ई-मेल: kmlshbhatt@yahoo.co.in 
ब्लॉग: http://www.gazalkamal.blogspot.com/
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1.पिंजरें में कैद पंछी कितनी उड़ान लाते
अपने परों में कैसे वो आसमान लाते।

कागज पे लिखने भर से खुशहालियाँ जो आतीं
अपनी गजल में हम भी हँसता सिवान लाते।

हथियार की जरूरत बिल्कुल नहीं थी भाई
मज़हब की बात करते, गीता कुरान लाते।

तन्हा ज़बान की तो लत झूठ की लगी थी
फिर रहनुमा कहाँ से सच की ज़बान लाते।

पहले ही सुन चुके हैं आँसू के खूब किस्से
अब तो कहीं से खुशियों की दास्तान लाते।

2.
औरत है एक कतरा, औरत ही खुद नदी है
देखो तो जिस्म, सोचो तो कायनात-सी है।

संगम दिखाई देता है उसमें गम़-खुशी का
आँखों में है समन्दर, होठों पे इक हँसी है।

ताकत वो बख्श़ती है ताकत को तोड़ सकती
सीता है इस ज़मीं की, जन्नत की उर्वशी है।

आदम की एक पीढ़ी फिर खाक हो गई है
दुनिया में जब भी कोई औरत कहीं जली है।

मर्दों के हाथ औरत बाजार हो रही है
औरत का गम नहीं ये मर्दों की त्रासदी है।

3.
देह के रहते ज़माने की कई बीमारियाँ भी हैं
आदमी होने की लेकिन हममें कुछ खुद्दारियाँ भी हैं।

कोई भी खुद्दार अपनी रूह का सौदा नहीं करता
और करता है तो इसमें उसकी कुछ लाचारियाँ भी हैं।

चाहतें जीने की छोड़ी जायेंगी हरगिज नहीं हमसे
जिन्दगी में यूँ कि ढेरों ढेर-सी दुश्वारियाँ भी हैं।

इस शहर से जिन्दगी को छीन सकता है नहीं कोई
मौत है इसमें अगर तो जन्म की तैयारियाँ भी हैं।

कोई झोंका फिर अलावों में तपिश भर जाएगा भाई
राख तो है राख के भीतर मगर चिन्गारियाँ भी हैं।

4.
मन नहीं बदले अगर तो सिर्फ तन से क्या ?
आये दिन के कीर्तन से या भजन से क्या ?

जो उजाला या तपिश कुछ भी न दे जाए
वह जले या बुझ भी जाए, उस अगन से क्या ?

बन्दिशें ही बन्दिशें जब हों उड़ानों पर
पंछियों को फिर परों से या गगन से क्या ?

आपके घर में हवा है और ताज़ा है
आपको माहौल की गहरी घुटन से क्या ?

ज़हनियत का भी पता देते हैं खुद कपड़े
ज़हनियत मर जाए तो फिर तन-बदन से क्या ?

जब गरीबों का कहीं कोई न अपना हो
मुल्क की सारी व्यवस्था से सदन से क्या ?

जो अँधेरों की तरफदारी में शामिल हो
वह किरन भी हो अगर तो उस किरन से क्या 

5.
मन स्वयं को दूसरों पर होम कर दे
माँ हमारी भावना तू व्योम कर दे !

ज्योति है तू ज्योत्सना का वास तुझमें
फिर अमावस से विलग तम तोम कर दे !

कुछ नहीं, कुछ भी नहीं तुझसे असम्भव
तू अगर चाहे गरल को सोम कर दे !

तू सनातन स्नेहमयि माँ, चिर तृषित हम
नेहपूरित देह का हर रोम कर दे !

धन्य हो जाए सृजन की पूत वीणा
माँ कृपा कर तू स्वरों को ओम कर दे !

6.
भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।

तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन
धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।

फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक
जरूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।

यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए हैं
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।

दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौका
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।

अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।

7.
बेशक छोटे हों लेकिन धरती का हिस्सा हम भी हैं
जैसे प्रभु की सारी रचना, वैसी रचना हम भी हैं।

इतना भी आसान नहीं है पढ़ना और समझ पाना
सुख की दुख की संघर्षों की पूरी गाथा हम भी हैं।

आज नहीं हो कल तुमको भी साथ हमारे चलना है
एक ज़माना तुम भी थे तो एक ज़माना हम भी हैं।

फ़न ने ही हमको दी है मर्यादा जीने मरने की
तो फिर फन के जीने मरने की मर्यादा हम भी हैं।

ईश्वर ने तो लिख रक्खा है सबके माथे पर लेकिन
अपने सुख के अपने दुख के एक विधाता हम भी हैं।

जब जब भी इच्छा होती है रास रचा लेते हैं हम
अपने मन के वृंदावन के छोटे कान्हा हम भी हैं।

8.
सफलता पाँव चूमे गम का कोई भी न पल आए
दुआ है हर किसी की जिन्दगी में ऐसा कल आए।

ये डर पतझड़ में था अब पेड़ सूने ही न रह जाएँ
मगर कुछ रोज़ में ही फिर नए पत्ते निकल आए।

हमारे आपके खुद चाहने भर से ही क्या होगा
घटाएँ भी अगर चाहें तभी अच्छी फसल आए।

हमें बारिश ने मौका दे दिया असली परखने का
जो कच्चे रंग वाले थे वो अपने रंग बदल आए।

जहाँ जिस द्वार पर देखेंगे दाना आ ही जाएँगे
परिन्दों को भी क्या मतलब कुटी आए महल आए।

हमारा क्या हम अपनी दुश्मनी भी भूल जाएँगे
मगर उस ओर से भी दोस्ती की कुछ पहल आए।

अभी तो ताल सूखा है अभी उसमें दरारें हैं
पता क्या अगली बरसातों में उसमें भी कमल आए।

9.
उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है
अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।

तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता
तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।

वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।

अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर
जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।

दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से
ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।

हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं
पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।

तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी
मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।

10.
कभी सुख का समय बीता, कभी दुख का समय गुजरा
अभी तक जैसा भी गुजरा मगर अच्छा समय गुजरा !

अभी कल ही तो बचपन था अभी कल ही जवानी थी
कहाँ लगता है इन आँखों से ही इतना समय गुजरा !

बहुत कोशिश भी की, मुट्ठी में पर कितना पकड़ पाए
हमारे सामने होकर ही यूँ सारा समय गुजरा !

झपकना पलकों का आँखों का सोना भी जरूरी है
हमेशा जागती आँखों से ही किसका समय गुजरा !

उन्हीं पेडों पे फिर से आ गए कितने नए पत्ते
उन्हीं से जैसे ही पतझार का रूठा समय गुजरा !

हमें भी उम्र की इस यात्रा के बाद लगता है
न जाने कैसे कामों में यहाँ अपना समय गुजरा !

11.
मुश्किलों से जूझता लड़ता रहेगा
आदमी हर हाल में ज़िन्दा रहेगा।

मंज़िलें फिर–फिर पुकारेंगी उसे ही
मंज़िलों की ओर जो बढ़ता रहेगा।

आँधियों का कारवाँ निकले तो निकले
पर दिये का भी सफर चलता रहेगा।

कल भी सब कुछ तो नहीं इतना बुरा था
और कल भी सब नहीं अच्छा रहेगा।

झूठ अपना रंग बदलेगा किसी दिन
सच मगर फिर भी खरा–सच्चा रहेगा।

देखने में झूठ का भी लग रहा है
बोलबाला अन्ततः सच का रहेगा।

12.
आदमी को खुशी से ज़ुदा देखना
ठीक होता नहीं है बुरा देखना।

पुण्य के लाभ जैसा हमेशा लगे
एक बच्चे को हँसता हुआ देखना।

रोशनी है तो है ज़िन्दगी ये जहाँ
कौन चाहेगा सूरज बुझा देखना।

सर–बुलन्दी की वो कद्र कैसे करे
जिसको भाता हो सर को झुका देखना।

ज़िन्दगी खुशनुमा हो‚ नहीं हो‚ मगर
ख़्वाब जब देखना‚ खुशनुमा देखना।

सारी दुनिया नहीं काम आएगी जब
काम आएगा तब भी खुदा‚ देखना।

13.
किसे मालूम‚ चेहरे कितने आखिरकार रखता है
सियासतदाँ है वो‚ खुद में कई किरदार रखता है।

किसी भी साँचे में ढल जाएगा अपने ही मतलब से
नहीं उसका कोई आकार‚ हर आकार रखता है।

निहत्था देखने में है‚ बहुत उस्ताद है लेकिन
ज़ेहन में वो हमेशा ढेर सारे वार रखता है।

ज़मीं तक है नहीं पैरों के नीचे और दावा है
वो अपनी मुट्ठियों में बाँधकर संसार रखता है।

बचाने के लिए खुद को‚ डुबो सकता है दुनिया को
वो अपने साथ ही हरदम कई मझधार रखता है।

14.
एक चादर–सी उजालों की तनी होगी
रात जाएगी तो खुलकर रोशनी होगी।

सिर्फ वो साबुत बचेगी ज़लज़लों में भी
जो इमारत सच की ईंटों से बनी होगी।

आज तो केवल अमावस है‚ अँधेरा है
कल इसी छत पर खुली–सी चाँदनी होगी।

जैसे भी हालात हैं हमने बनाये हैं
हमको ही जीने सूरत खोजनी होगी।

बन्द रहता है वो खुद में इस तरह अक्सर
दोस्ती होगी न उससे दुश्मनी होगी।

15.
पत्थरों का शहर‚ पत्थरों की गली
पत्थरों की यहाँ नस्ल फूली फली

आप थे आदमी‚ आप हैं आदमी
बात यह भी बहूत पत्थरों को खली

एक शीशा न बचने दिया जायेगा
गुफ़्तगू रात भर पत्थरों में चली

खिलखिलाते हुए यक ब यक बुझ गई
पत्थरों के ज़रा ज़िक्र पर ही कली

जो कि प्यासे रहे खून के‚ मौत के
एक नदिया उन्हीं पत्थरों में पली

16.
पेड, कटे तो छाँव कटी फिर आना छूटा चिड़ियों का
आँगन आँगन रोज, फुदकना गाना छूटा चिड़ियों का

आँख जहाँ तक देख रही है चारों ओर बिछी बारूद
कैसे पाँव धरें धरती पर‚ दाना छूटा चिड़ियों का

कोई कब इल्ज़ाम लगा दे उन पर नफरत बोने का
इस डर से ही मन्दिर मस्जिद जाना छूटा चिड़ियों का

मिट्टी के घर में इक कोना चिड़ियों का भी होता था
अब पत्थर के घर से आबोदाना छूटा चिड़ियों का

टूट चुकी है इन्सानों की हिम्मत कल की आँधी से
लेकिन फिर भी आज न तिनके लाना छूटा चिड़ियों का

17.
समन्दर में उतर जाते हैं जो हैं तैरने वाले
किनारे पर भी डरते हैं तमाशा देखने वाले

जो खुद को बेच देते हैं बहुत अच्छे हैं वे फिर भी
सियासत में कई हैं मुल्क तक को वेचने वाले

गये थे गाँव से लेकर कई चाहत कई सपने
कई फिक्रें लिये लौटे शहर से लौटने वाले

बुराई सोचना है काम काले दिल के लोगों का
भलाई सोचते ही हैं भलाई सोचने वाले

यकीनन झूठ की बस्ती यहाँ आबाद है लेकिन
बहुत से लोग जिन्दा हैं अभी सच बोलने वाले

18.
समय के साथ भी उसने कभी तेवर नहीं बदला
नदी ने रंग बी बदले‚ मगर सागर नहीं बदला

न जाने कैसे दिल से कोशिशें की प्यार की हमने
अभी तक शब्द "नफरत" का कोई अक्षर नहीं बदला

ज,रूरत से ज़्यादा हो‚ बुरी है कामयाबी भी
कोई विरला ही होगा जो इसे पाकर नहीं बदला

पुराने पत्थरोँ की हो गई पैदा नई फसलें
लहू की प्यास वैसी है‚ कोई पत्थर नहीं बदला

जिसे कुछ कर दिखाना है चले वो वक्त से आगे
किसी ने वक्त को उसके ही सँग चलकर नहीं बदला

19.
पास रक्खेगी नहीं सब कुछ लुटायेगी नदी
शंख शीपी रेत पानी जो भी लाएगी नदी

आज है कल को कहीं यदि सूख जाएगी नदी
होठ छूने को किसी का छटपटाएगी नदी

बैठना फुरसत से दो पल पास जाकर तुम कभी
देखना अपनी कहानी खुद सुनाएगी नदी

साथ है कुछ दूर तक ही फिर सभी को छोड़कर
खुद समन्दर में किसी दिन डूब जाएगी नदी

हमने वर्षों विष पिलाकर आजमाया है जिसे
अब हमें भी विष पिलाकर आजमाएगी नदी

20.
टूटते भी हैं‚ मगर देखे भी जाते हैं
स्वप्न से रिश्ते कहाँ हम तोड़ पाते हैं।

मंज़िलें खुद आज़माती हैं हमें फिर फिर
मंज़िलों को हम भी फिर फिर आज़माते हैं।

चाँद छुप जाता है जब गहरे अँधेरे में
आसमाँ में तब भी तारे झिलमिलाते हैं।

दर्द में तो लोग रोते हैं‚ तड़पते हैं
पर‚ खुशी में वे ही हँसते–मुस्कराते हैं।

ज़िन्दगी है धर्मशाले की तरह‚ इसमें
उम्र की रातें बिताने लोग आते हैं।


21.
कोई मगरूर है भरपूर ताकत से
कोई मजबूर है अपनी शराफत से

घटाओं ने परों को कर दिया गिला
बहुत डर कर परिंदों के बग़ावत से

मिलेगा न्याय दादा के मुकद्दमे का
ये है उम्मीद पोते को अदालत से

मुवक्किल हो गए बेघर लड़ाई में
वकीलों ने बनाए घर वकालत में

किसी ने प्यार से क्या क्या नहीं पाया
किसी ने क्या क्या नहीं खोया अदावत से

22.
वृक्ष अपने ज़ख्म आखिर किसको दिखलाते
पत्तियों के सिर्फ पतझड़ तक रहे नाते।

उसके हिस्से में बची केवल प्रतीक्षा ही

अब शहर से गाँव को खत भी नहीं आते।

जिनकी फितरत ज़ख़्म देना और खुश होना

किस तरह वे दूसरों के ज़ख़्म सहलाते।

अपनी मुश्किल है तो बस खामोश बैठे हैं

वरना खुद भी दूसरों को खूब समझाते।

खेल का मैदान अब टेलीविज़न पर है

घर से बाहर शाम को बच्चे नहीं जाते।

23.

नाउमीदी में भी गुल अक्सर खिले उम्मीद के
जिसने चाहे, रास्ते उसको मिले उम्मीद के।

जोड़ने वाली कोई क़ाबिल नज़र ही चाहिए

हर तरफ बिखरे पड़े हैं सिलसिले उम्मीद के।

फिर नई उम्मीद ही आकर सहारा दे गई

रास्ते में पाँव जब-जब भी हिले उम्मीद के।

दौलतों से, किस्मतों से जो नहीं जीते गए

जीत लाएँगे पसीने, वो किले उम्मीद के।

कौन कहता है सफर में हम अकेले रह गए

साथ हैं अब भी हमारे, क़ाफ़िले उम्मीद के।

24.

हादसों की बात पर अल्फाज़ गूँगे हो गए
मुल्क में अब हर तरफ हालात ऐसे हो गए।

ठीक है, हमको नहीं मंज़िल मिली तो क्या हुआ
इस बहाने ही सही, कुछ तो तज़ुरबे हो गए।

पाठशाला प्रेम की कोई नहीं खोली गई

नफ़रतों के, हर शहर, घर-घर मदरसे हो गए।

जब बहुत दिन तक नहीं कोई खब़र आई-गई

आप हमसे, आपसे हम बेखब़र-से हो गए।

ढेर-सी अच्छाइयों का ज़िक्र तक आया नहीं

इक बुराई के, शहर में खूब चर्चे हो गए।

रोशनी अब भी नहीं बिल्कुल मरी है, मानिए

बस हुआ ये है धुँधलके और गहरे हो गए।

25.
आँखों में सपने रहे, परवाज़ से रिश्ता रहा
मैंने चाहा और मैं हर हाल में ज़िन्दा रहा।

कुछ सचाई हो किसी में बात यह भी कम नहीं

झूठ के बाजार में कोई कहाँ सच्चा रहा।

क्या सही है क्या गलत, ये वक्त़ ही खुद तय करे

जो मुझे वाजिब लगा, मैं बस वही करता रहा।

ज़िन्दगी की पाठशाला में यहाँ पर उम्र भर

वृद्ध होकर भी हमेशा आदमी बच्चा रहा।

मील का पत्थर बना कोई खड़ा ही रह गया
और कोई रास्तों पर दूर तक चलता रहा।

26.

आदमी की कब मुकम्मल ज़िन्दगी देखी गई
कुछ न कुछ हर शख्स में अक्सर कमी देखी गई।

उनसे खुशियाँ गैर की बर्दाश्त होतीं किस तरह

जिनसे अपनी ही नहीं कोई खुशी देखी गई।

दूसरों के क़त्ल पर भी नम नहीं आँखें हुईं

अपने ज़ख्मों पर मगर उनमें नदी देखी गई।

मन्दिरों में, मस्जिदों में अन्तत: वह एक थी

हर तरफ, हर रंग में जो रोशनी देखी गई।

जाँ-निसारी ही अकेली एक पैमाइश रही

दोस्ती में कब भला नेकी-बदी देखी गई।

27.

कौन जाने इस शहर को क्या हुआ है दोस्तो
अजनबी-सा हर कोई चेहरा हुआ है दोस्तो।

मज़हबों ने बेच दी है मन्दिरों की आत्मा

मस्जिदों की रूह का सौदा हुआ है दोस्तो।

कौन मानेगा यहाँ पर भी इबादतगाह थी

ज़र्रा-ज़र्रा इस क़दर सहमा हुआ है दोस्तो।

कुछ दरिन्दे और वहशी लोग रहते हैं यहाँ

आप सबको भ्रम शरीफों का हुआ है दोस्तो।

ज़िन्दगी आने से भी कतराएगी बरसों-बरस

हर गली में मौत का जलसा हुआ है दोस्तो।

हर कोई झूठी तसल्ली दे रहा है इन दिनों

ये शहर रूठा हुआ बच्चा हुआ है दोस्तो।

ज़िन्दगी फिर भी रहेगी ज़िन्दगी, हारेगी मौत

पहले भी मंज़र यही देखा हुआ है दोस्तो।

28.

आपने उसकी तबाही का कोई अवसर नहीं छोड़ा
जुल्म की हद ने ही उसमें जुल्म का कुछ डर नहीं छोड़ा।

कुछ अजब अन्दाज़ में आँधी चली हर बार मज़हब की

उसने कोशिश भर, कहीं पर खुशनुमा मंज़र नहीं छोड़ा।

घर जलाकर जिसने बेघर कर दिया था बुगुनाहों को

कोई साया, वक्त़ ने उस शख्स़ के सर पर नहीं छोड़ा।

पूजने भर से किसी को कब मिला है आज तक ईश्वर

पूजने वालों ने तो कोई कहीं पत्थर नहीं छोड़ा।

नोचने वालों के कदमों से लिपट कर रह गया आखिर

आदमी का फूल ने हर हाल में आदर नहीं छोड़ा।

29.
याद आए तो आँख भर आए
किन ज़मानों से हम गुज़र आए।

पाँव में दम ज़रा रहे बाकी

क्या पता कैसा कल सफर आए।

उसने चढ़ ली है ऐसी ऊँचाई

गैर मुमकिन है वो उतर आए।

सबके चेहरे पे कुछ खुशी आये

आए कैसे भी वो, मगर आए।

हमने पहले न कम सुनी खब़रें

जो भी आनी हो अब खब़र आए।

आसमां भी उदास रहता है

सोचता है ज़मीन पर आए।

30.

बनाए घर गरीबों के, अमीरों के
बहुत कम घर बने हैं राजगीरों के।

उन्हें अपने-पराये से भी क्या मतलब

सभी घर, घर हुआ करते फ़कीरों के।

कोई अच्छी लिखी किस्मत बुरी कोई

अजब अन्दाज़ होते हैं लकीरों के।

नहीं पहचान जिस्मों के बिना सम्भव

बहुत एहसान रूहों पर शरीरों के।

कहीं पर भी बुराई हो, न बख्श़ेंगे

कभी मज़हब नहीं होते कबीरों के।