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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 16 सितंबर 2013

अशोक आलोक

जन्म स्थान जमालपुर, बिहार, लिबास (ग़ज़ल-संग्रह)

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१. 
हिफ़ाज़त में कोई पलता हुआ नासूर लगता है
सियासत से बहुत छोटा हरेक कानून लगता है

हमें तो जश्न का मौसम बड़ा मासूम लगता है
किसी बच्चे के हाथों में भरा बैलून लगता है

न जाने क्यों कभी ख़ामोशियों में दर्द चेहरे का
हथेली पर लिखा प्यारा कोई मज़मून लगता है

हज़ारों ख़्वाहिशें दिल में अमन के वास्ते लेकिन
दुआ का हाथ जाने क्यों बहुत मायूस लगता है

मज़ा आता है अक्सर यूं बुझाने में चिराग़ों को
हवा को क्या पता कितना जिगर का खून लगता है

२.
नए हालात अक्सर आज़माते हैं
पुराने वक्त के तेवर दिखाते हैं ।

बिखरते टूटते हर आशियाने में
न जाने लोग कैसे मुस्कुराते हैं।

ज़मीं से आसमां तक मौत के बादल
नज़र के सामने हलचल मचाते हैं।

शिकायत का यही अंजाम होता है
उमर भर दर्द के रिश्ते निभाते हैं।

गुज़रते वक्त के हर खुशनुमां हिस्से
सदा तन्हाइयों में याद आते हैं।

३.
फूल ऑंगन में उगा देता है
आस जीने की जगा देता है

जब भी आता बहार का मौसम
आग दामन में लगा देता है

ग़ैर से उम्मीद भला क्या रखिए
जबकि अपना ही दगा देता है

ज़ख़्म देने का सिलसिला रखकर
जो भी देता है सगा देता है

साथ रखता है उम्रभर लेकिन
दिल की चौखट से भगा देता है

४.
दोस्तों की दोस्ती और घात से गुज़रे
ज़िन्दगी के खुरदरे हालात से गुज़रे

ख्वाब की कलियां सजाए आशियाने में
धूप ऑंखों में लिए बरसात से गुज़रे

एक लम्हा चैन का उस ज़िन्दगी में क्या
थरधराते होंठ के जज़्बात से गुज़रे

जुर्म के सारे फ़साने सामने आए
जब भी बेबस की सुलगती बात से गुज़रे

साफ चेहरा वक्त का जी भर तभी देखा
ज़िन्दगी के खेल में जब मात से गुज़रे

फ़िक्र के साये में जीने का सबब है क्या
क्या पता है आपको किस बात से गु्ज़रे

५.
दु:ख की चादर समेट बाहों में
ख्वाब देखे हैं इश्तिहारों में

चंद सांसों की ज़िन्दगी अपनी
रोज़ उड़ती है ये हवाओं में

बात इतनी हसीन मत करिए
चाँद आने लगा है ख्वाबों में

गाँव पत्थर हुआ शहर गूंगा
लोग बदले हैं ईंटगारों में

कोई मुमकिन जवाब क्या देगा
जबकि उलझे हैं खुद सवालों में

कोई सूरज को ढूंढकर लाए
ऐसी बदली हुई फिज़ाओं में

६.
ख़यालों के ज़माने सामने हैं
हक़ीक़त और फ़साने सामने हैं

मेरी ही उम्र की परछाइयां बन
मेरे बच्चे सयाने सामने हैं

कहानी ज़िन्दगी की है पुरानी
नएपन के तराने सामने हैं

तेरी ख़ामोशियों के सिलसिलों में
मेरे सपने सुहाने सामने हैं

नहीं वादे निभा सकने के बदले
कई दिलकश बहाने सामने हैं

७.
निकाले दिल से डर मुश्किल बहुत है
करे पूरा सफ़र मुश्किल बहुत है।

बहारें लौटकर आए किसी दिन
उदासी में गुज़र मुश्किल बहुत है।

किसी भी हाल में बेदाग़ रहना
किसी में ये हुनर मुश्किल बहुत है।

न जाने क्या हुआ है इस जहां को
खुला हो कोई दर मुश्किल बहुत है।

भले ही पास है मंज़िल हमारी
इसे छू लूं मगर मुश्किल बहुत है