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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

डॉ. गौतम सचदेव के दोहे

परिचय : यहाँ देखें


मेरी  भव  बाधा  हरौ  राधा  नागरि सोय।
सिमरन करते ही सदा जो काला धन धोय।।१।।

माली आवत देखके कलियाँ करें पुकार।
नेता डालें कंठ में गूँथो ऐसा हार।।२।।

माला फेरत युग गया मिटा न मन का फेर।
नारे खूब लगाय के जनता का मन फेर।।३।।

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर घूस के पढ़े सो पंडित होय।।४।।

लाली मेरे लाल की ऊपर ऊपर लाल।
ज्यों कालिख पर हों पुते मेहंदी और गुलाल।।५।।

रहिमन कुर्सी राखिये बिन कुर्सी सब सून।
कुर्सी से उजले बनें चोरी रिश्वत खून।।६।।

जग में बंधते हैं वहीं जो हैं खर पतवार।
दास कबीरा क्यों बंधे गंुडे नेता यार।।७।।

आये हैं सो जायेंगे राजा रंक फकीर।
यही देखकर मर रहा सबका रोज ज़मीर।।८।।

जप माला छापा तिलक केवल जय जय राम।
सत्ता धन इनसे मिलें धर्म बढ़े बल धाम।।९।।

वृक्ष नहीं निज फल चखे नदी न संचय नीर।
विषमय पर्यावरण से बचने की तदबीर।।१०।।

आये दिन मतदान के नेता में उत्साह।
वादे मुद्दे ढूँढ़कर लाता नित्य अथाह।।११।।

उत्तम नेता हैं वही जिसका सूप सुभाय।
'सीट नोट' को गहिं रहैं वादे देत उड़ाय।।१२।।

झूठे सुख संसार में सच्चा सुख है 'सीट'।
'सीट' बिना नर हो रहे गर्दभ कूकर कीट।।१३।।

तुलसी इस संसार को छोड़ेगा क्यों कोय।
कंचन कुर्सी कामिनी काया का सुख होय।।१४।।

माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख महिं।
आंखें माया में फिरें सत्य धर्म कहलाहिं।।१५।।

प्रभु नेता दोनों खड़े किसके लागूँ पाँय।
राजनीति तुम धन्य हो दोनों दिये मिलाय।।१६।।

आशा पर अटके रहें वे नर केवल 'फूल'।
जोड़ तोड़ से जन गुणी करते सब अनुकूल।।१७।।

छुटभैये नेता भये कोलाहल जनवीर।
दुखियारे मस्तक घिसें प्यादे बने वज़ीर।।१८।।

वाह वाह की चाह रख लाज शरम रख दूर।
अपनी डफली खुद बजा होगा तब मशहूर।।१९।।

मैं मैं बहुत सुहावनी करो मचाकर शोर।
वर्षा ऋतु में जिस तरह पंख पसारे मोर।।२०।।

नाम कमाने के लिये खूब बजा तू ढोल।
नाम रतन धन पाय के मंच सजाकर बोल।।२१।।

सभी रसायन झूठ है नहीं नाम सम कोय।
मिले जवानी नाम से नेता कंचन होय।।२२।।

कारज धीरे होत हैं काहे होत अधीर।
सुलझेगा सौ जन्म में विकट प्रश्न कश्मीर।।२३।।

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।
पाँच बरस की योजना सौ में पूरी होय।।२४।।

गंदा भी है भ्रष्ट भी निर्धन आलीशान।
चींटीं जैसी चाल है भारत देश महान।।२५।।

अवगुन बिन पूछे नहीं जग में कोई आज।
निकले पूत कपूत तो पिता करत है नाज़।।२६।।

साईं इतना दीजिए जिसमें कुटुम्ब समाय।
मैं अरू अगली पीढ़ियाँ बैठे बैठे खायँ।।२७।।

मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ हैं सब तोर।
दिन में बोलो ये वचन रातों रात बटोर।।२८।।

जब हरि थे तब हम नहीं अब हम हैं हरि नायं।
हमने प्रतिमा 'ब्लैक' से उसकी दी लगवाय।।२९।।

रहे श्याम घन 'ब्लैक' में ज्यों फूलों में बास।
करो 'ब्लैक' पूजा मिले बंगलों में मधुवास।।३०।।

तुलसी इस संसार में सबसे मिलिये धाय।
क्या जाने किस भेस में अगला नेता आय।।३१।।

जोड़ तोड़ करके हुए समरथ जग के लोग।
मेल मिलावट के नये हंस सराहन योग।।३२।।

हाकिम जब बनिया बने सहज करे व्यापार।
बिन डंडी पलड़े बिना लाखों करदें पार।।३३।।

जिसको राखे साइयाँ मरे नहीं कर भूल।
गुंडे मिलकर पुलिस से हफ्ता करें वसूल।।३४।।

साईं तुझसे छिप छिपा कौड़ी नहीं बिकाय।
जिसके सिर नेता पुलिस भरत तिजोरी जाय।।३५।।

शब्द बराबर धन नहीं नेता जाने मोल।
भाषण चादर तान के ढक ले अपनी पोल।।३६।।

नमक घुला पानी बना फिर नहिं दीखे आन।
राजनीति के नोन का इससे उलट बखान।।३७।।

कहकर भी कहते रहो अब कुछ कहा न जाय।
नये मौन का व्रत यही बोल मोल बढ़ जाय।।३८।।

चहुँ दिशि दमके दामिनी बादल गहर गंभीर।
वर्षा नेता लायेगा करता है तकरीर।।३९।।

बिन खोजे वे पायेंगे मारें गहरे हाथ।
मेहनत ही करता रहे मरता वहीं अनाथ।।४०।।

भूखा सत्ता के लिए नेता गिरगिट भेस।
रहे लिसोढ़े की तरह चिपके यथा सरेस।।४१।।

जनसेवक होता वही करता फिरे बखान।
शासन मैं ही कर सकूँ या मेरी सन्तान।।४२।।

पाकर चिपका ही रहे रसना भोगे स्वाद।
पद पदवी का रस चखे जनता का उस्ताद।।४३।।

गगन गरज जनतन्त्र में कंचन बरसें नीर।
दो कौड़ी के थे कभी रातों रात अमीर।।४४।।

दीपक जोया ज्ञान का करें अंधेरा दूर।
सेवा बिन मेवा मिले फिर क्यों बनो मजूर।।४५।।

पानी ही से हिम बिना हिम को लेउ गलाय।
टिकट न दे दल से कहो ठेका ही दिलवाय।।४६।।

कबिरा भरम बढ़ाय के बहु विधि धारो भेख।
मुठ्ठी में सब कुछ करो क्या पंडित क्या शेख।।४७।।

ज्यों गंूगे के सैन को गंूगा ही पहचान।
त्यों चोरों के गुर सभी चोरों से लो जान।।४८।।

गुन को कोई ना गहें अवगुन ही ले बीन।
माखी ज्यों विष्टा गहे माने गन्ध नवीन।।४९।।

सम दृष्टि सत गुरू किया मेटा जगत विकार।
जित देखूँ तित वंश ही दिखते नम्बरदार।।५०।।

सुनी लिखी तो हैं नही आँखिन देखी बात।
दुर्जन संग सत्ता भगी बैठी रहे बरात।।५१।।

हम मानत हैं खायेंगे जीवन भर तर माल।
छीन झपट घर भर लिया शायद पड़े अकाल।।५२।।

जंगल में लकड़ी कटी थूनी करे पुकार।
बचना कठिन कुठार से अफसर हिस्सेदार।।५३।।

कल ठगना है आज ठग आज ठगे सो अब।
पल में परलै होयगी और ठगेगा कब्ब।।५४।।

कबिरा नौबत आपनी दस दिन लेहु बजाय।
कुर्सी मौका सम्पदा रोज न मिलते आय।।५५।।

जब भी हो जाये कहीं घटना या संयोग।
जनता को उल्लू बना बिठा जांच आयोग।।५६।।

पांचों नौबत बाजती फैल रही है साख।
ढोंग महातम का किया दुनिया पूजे राख।।५७।।

कबिरा गर्व ही कीजिये पा जोबन की शान।
ऐश कभी मत छोड़िए जब तक घट में प्रान।५८।।

ऐसा यह संसार है जैसा सेमर फूल।
तितली भौरे फांस लो फिर तो मिलना धूल।।५९।।

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रूंधे मोय।
ठेके में लग लूँ ज़रा तब रूंधूँगी तोय।।६०।।

कबिरा यह तन जा रहा अवसर को मत छोड़।
उल्टी सीधी चाल से जोड़ सके जो जोड़।।६१।।

दुर्लभ मानुष जन्म है देह न बारम्बार।
भोग सुखों की लॉटरी खाकर भूल उधार।।६२।।

आस पास जोधा खड़े सभी बजावें गाल।
धूल झोंक कर आँख में चल तू अपनी चाल।।६३।।

निशि वासर सुख ही रहे औ सुख सपने माँह।
जिसकी गाड़ी चल रही पकड़ो उसकी बांह।।६४।।

ऐसी जुगत निकालिए काला धवल दिखाय।
पाप दिखे ज्यों पुण्य हैं सब कलंक धुल जाय।।६५।।

कबिरा दुनिया माट है मन्थन समुझे कोय
औरन को मट्ठा बना मक्खन लेत बिलोय।।६६।।

बकरी पाती खात है तभी खिंचाती खाल।
नर के भक्षक जगत में होते मालामाल।।६७।।

फोड़ों आँख विवेक की भूलो सन्त असन्त।
पट्ठे बढ़िया पालकर भोगो नित्य वसन्त।।६८।।

कामी क्रोधी लालची यही भगत अब होय।
सच्चा साधू सन्त है मालपुए खा सोय।।६९।।

भगती है चौगान सी कन्दुक माला जाप।
चेला अश्व बनाय के काटो भव त्रय ताप।।७०।।

जल मछली की जान है लोभी की है दाम।
माता की सन्तान है हाकिम 'सीट' सलाम।।७१।।

मिला माफिया संग तो तस्कर रख लो यार।
ऐश करो परदेस में बनकर साहूकार।।७२।।

पहिले बुरा कमाय के बांधों विष की मोट।
हिस्सा दे भगवान को माफ कराओ खोट।।७३।।

काम क्रोध मद लोभ की जब तक घट में खान।
तब तक भगवा भेस घर बन जाओ भगवान।।७४।।

कोटि भरम चाहे करे होवे भरा विकार।
वही सराहा जायेगा जिसमें है हंकार।।७५।।

मैं भौरें से कह रहा बास बनों की लेय।
फूलों का रस चूस ले धेला एक ने देय।।७६।।

लाला 'टेक्स' न दीजिये करके हर व्यापार।
धरो मुनाफा जेब में झक मारे सरकार।।७७।।

चलती चक्की देख के कबिरा प्रमुदित होय।
दो पाटो में पीस लो दुनिया जो भी बोय।।७८।।

फुल बोय तेरे लिए बो उसके तू शूल।
तुझे हार पहनाय जब उसको सौंप बबूल।।७९।।

दुर्बल को दुख दीजिए समरथ कर अनुकूल।
लाठी सिर पर ही पड़े कुचले जाते फूल।।८०।।

इस दुनिया में आ गया छोड़ नहीं तू ऐंठ।
ले ले धौंस जमाय के उठी जात है पैंठ।।८१।।

ऐसी बानी बोलिये दिल को देवे चीर।
अपना मन शीतल करे दूजे को नक्सीर।।८२।।

हाथी चढ़ ले ज्ञान के बन जा बस बटमार।
श्वान रूप संसार है भूँकन दे झक मार।।८३।।

मतलब अपना साध ले बन कूकर या भेड़।
तुझे पराई क्या पड़ी अपनी आप निबेड़।।८४।।

आती गाली एक है पलटी बने अनेक।
कह कबीर गाली बको बनो कभी मत नेक।।८५।।

बहता बहने दे सदा नहीं बचा ला कूल।
जिसे डूबना डूब ले कीचड़ हो या धूल।।८६।।

सकल बुराई पास रख बढ़िया जनम बिताय।
कौए के निज भेस को बनकर हंस छिपाय।।८७।।

अपने पहरे जागिए मत पड़ रहिए सोय।
पुलिस मिली है चोर से जो सोये सो खोय।८८।।

अन्न अधिक ले पेट से तन से बढ़कर चीर।
कोठे भर भर कर जमा दुनिया रहे फकीर।।८९।।

डटकर खा तर माल तू सो जा लम्बी तान।
अपने घर कर रोशनी जग होवे शमशान।।९०।।

चमचे नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय।
नित तारीफ कराइये विज्ञापन छपवाय।।९१।।

दोष पराया देखकर खूब मचाओ शोर।
अपने अवगुण को कहो गुण ही गुण घनघोर।।९२।।

झूठ बराबर तप नहीं नित्य बराबर पाप।
जाके दिल में झूठ हैं दाता माई बाप।।९३।।

चिकनी चुपड़ी हड़प ले लोटे गटक शराब।
गर उधार चढ़ जाय तो दाता का मुख दाब।।९४।।

मन में पीछे ही चलो मन आनन्द अनेक।
जो मन पर चढ़कर चले दुख को देता फेंक।।९५।।

ओछे जग में हैं बड़े ऊंचे ज्यों मीनार।
शासक बनने के लिए नित्य लगा दरबार।।९६।।

जाति पांति शोभित सदा ज्यों जंगल में घास।
भेद मिटाकर मत करो जग का सत्यनास।।९७।।

लड़ो धरम के नाम पर बनो धरम निरपेख।
'वोट बैंक' खुल जाएंगे मन्दिर मस्जिद देख।।९८।।

बकते हैं जो कह रहे हिन्दी हैं सिरमौर।
अंगरेजी पढ़ पढ़ करो उनके दुख पर गौर।।९९।।

धोती कुर्ते में पड़ी हिन्दी बिन पतलून।
'नेल कटर' इंग्लिश पकड़ काटो यह नाखून।।१००।।

योगा वेदा इंडिया बुद्धा को कर याद।
केवल इंग्लिश में पढ़ो इन सबके अनुवाद।।१०१।।

छोड़ पुरातन पन्थ को चलो विदेशी गैल।
मोटर पश्चिम की भली चाम योग है बैल।।१०२।।

नीति नई जग की यही गुरूजन वाणी सार।
जनसेवा छिलका निरा गूदा निज उपकार।।१०३।।

नीतिशतक नवनीत है जीवन अनुभव गूढ़।
समझेगा मतिमान ही सिर फोड़े निज मूढ़।।१०४।।