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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

श्रद्धा जैन


परिचय :
जन्म: 08 नवंबर 1977,विदिशा, मध्य प्रदेश
संप्रति सिंगापुर में हिंदी अध्यापिका हैं ।
ब्लॉग
: भीगी ग़ज़लें
सम्पर्क
:shrddha8@gmail.com
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१. 
शीशे के बदन को मिली पत्थर की निशानी
टूटे हुए दिल की है बस इतनी-सी कहानी

फिर कोई कबीले से कहीं दूर चला है
बग़िया में किसी फूल पे आई है जवानी

कुछ आँखें किसी दूर के मंज़र पर टिकी हैं
कुछ आँखों से हटती नहीं तस्वीर पुरानी

औरत के इसी रूप से डर जाते हैं अब लोग
आँचल भी नहीं सर पे नहीं आँख में पानी

तालाब है, नदियाँ हैं, समुन्दर है पर अफ़सोस
हमको तो मयस्सर नहीं इक बूंद भी पानी

छप्पर हो, महल हो, लगे इक जैसे ही दोनों
घर के जो समझ आ गए ‘श्रद्धा’ को मआनी

२.
तेरे बगैर लगता है, अच्छा मुझे जहाँ नहीं
सरसर लगे सबा मुझे, गर पास तू ए जाँ नहीं

कल रात पास बैठे जो, कुछ राज़ अपने खुल गये
टूटा है ऐतमाद बस, ये तो कोई ज़ियाँ नहीं

मैं जल रही थी मिट रही, थी इंतिहा ये प्यार की
अंजान वो रहा मगर, शायद उठा धुआँ नहीं

कुछ बात तो ज़रूर थी, मिलने के बाद अब तलक
खुद की तलाश में हूँ मैं, लेकिन मेरे निशाँ नहीं

दुश्मन बना जहान ये, ऐसी फिज़ा बनी ही क्यूँ
मेरे तो राज़, राज़ हैं, कोई भी राज़दां नहीं

अंदाज़-ए-फ़िक्र और था “श्रद्धा” ज़ुदाई में तेरी
कह कर ग़ज़ल में बात सब, कुछ भी किया बयाँ नहीं

३.
ऐसा नहीं कि हमको, मोहब्बत नहीं मिली

बस यह हुआ कि हस्बे-ज़रुरत नहीं मिली

दौलत है, घर है, ख़्वाब हैं, हर ऐश है मगर
बस जिसकी आरज़ू थी वो चाहत नहीं मिली

उससे हमारा क़र्ज़ उतारा नहीं गया
इन आंसुओं की आज भी क़ीमत नहीं मिली

देखे गए हैं जागती आँखों से कितने ख्वाब
हमको ये सोचने की भी मोहलत नहीं मिली

हालाँकि सारी उम्र ही गुज़री है उनके साथ
“श्रद्धा” मेरा नसीब कि क़ुरबत नहीं मिली

४.
मुश्किलें आएँगी जब, ये फैसला हो जाएगा
कितने पानी में है सब, इसका पता हो जाएगा

दूरियाँ दिल की कभी जो, बढ़ भी जाएँ हमसफ़र
रोकना मत तुम क़दम, तय फासला हो जाएगा

लाए थे दुनिया में क्या तुम, लेके तुम क्या जाओगे
क्या महल, क्या रिश्ते-नाते, सब जुदा हो जाएगा

तुम दुआ मांगों तो दिल से और रखो उस पर यक़ीन
गर बुरा होना भी होगा, तो भला हो जाएगा

आरज़ू थी फूल इक, दामन में खिल जाए मेरे
और गर ये भी न हो तो क्या ख़ला हो जाएगा

ज़िंदगी के रास्ते होते ही हैं काँटों भरे
साथ 'श्रद्धा' भी रही तो हौसला हो जाएगा

५.
जाने वाले कब लौटे हैं क्यूँ करते हैं वादे लोग
नासमझी में मर जाते हैं हम से सीधे सादे लोग

पूछा बच्चों ने नानी से - हमको ये बतलाओ ना
क्या सचमुच होती थी परियां, होते थे शहज़ादे लोग ?

टूटे सपने, बिखरे अरमां, दाग़ ए दिल और ख़ामोशी
कैसे जीते हैं जीवन भर इतना बोझा लादे लोग

अम्न वफ़ा नेकी सच्चाई हमदर्दी की बात करें
इस दुनिया में मिलते है अब, ओढ़े कितने लबादे लोग

कट कर रहते - रहते हम पर वहशत तारी हो गई है
ए मेरी तन्हाई जा तू, और कहीं के ला दे लोग

६.
मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी है
मगर कैसे बताऊँ मैं ये किसकी मेहरबानी है

खुला ये राज़ मुझ पर ज़िंदगी का देर से शायद
तेरी दुनिया भी फानी है, मेरी दुनिया भी फ़ानी है

वफ़ा नाज़ुक सी कश्ती है ये अब डूबी कि तब डूबी
मुहब्बत में यकीं के साथ थोड़ी बदगुमानी है

ये अपने आइने की हमने क्या हालत बना डाली
कई चेहरे हटाने हैं, कईं यादें मिटानी हैं

तुम्हें हम फासलों से देखते थे औ'र मचलते थे
सज़ा बन जाती है कुरबत, अजब दिल की कहानी है

मिटा कर नक्श कदमों के, चलो अनजान बन जाएँ
मिलें शायद कभी हम-तुम, कि लंबी ज़िंदगानी है

ये मत पूछो कि कितने रंग पल-पल मैंने बदले हैं
ये मेरी ज़िंदगी क्या, एक मुजरिम की कहानी है

किताबे-उम्र का बस इक सबक़ ही याद है मुझको
तेरी कुर्बत में जो बीता वो लम्हा जावेदानी है

वफ़ा के नाम पर 'श्रद्धा' न हो कुर्बान अब कोई
कहानी हीर-रांझा की पुरानी थी, पुरानी है

७.
जब हमारी बेबसी पर मुस्करायीं हसरतें
हमने ख़ुद अपने ही हाथों से जलाईं हसरतें

ये कहीं खुद्दार के क़दमों तले रौंदी गईं
और कहीं खुद्दरियों को बेच आईं हसरतें

सबकी आँखों में तलब के जुगनू लहराने लगे
इस तरह से क्या किसी ने भी बताईं हसरतें

तीरगी, खामोशियाँ, बैचेनियाँ, बेताबियाँ
मेरी तन्हाई में अक्सर जगमगायीं हसरतें

मेरी हसरत क्या है मेरे आंसुओं ने कह दिया
आपने तो शोख रंगों से बनाईं हसरतें

सिर्फ तस्वीरें हैं, यादें हैं, हमारे ख़्वाब हैं
घर की दीवारों पे हमने भी सजाईं हसरतें

इस खता पे आज तक 'श्रद्धा' है शर्मिंदा बहुत
एक पत्थरदिल के क़दमों में बिछायीं हसरतें

८.
नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए

तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए

फ़ज़ा में देर तलक साँस के शरारे थे
कहा है कान में कुछ उसने पास आते हुए

हरेक नक्श तमन्ना का हो गया उजला
तेरा है लम्स कि जुगनू हैं जगमगाते हुए

दिल-ओ-निगाह की साजिश जो कामयाब हुई
हमें भी आया मज़ा फिर फरेब खाते हुए

बुरा कहो कि भला पर यही हक़ीकत है
पड़े हैं पाँव में छाले वफ़ा निभाते हुए

९.
किसी उजड़े हुए घर को बसाना
कहाँ मुमकिन है फिर से दिल लगाना

यकीनन आग बुझ जाती है इक दिन
मुसलसल गर पड़े ख्वाहिश दबाना

वो उस पल आसमां को छू रहा था
ये क्या था, उसका चुपके से बुलाना

ये सच है राह में कांटे बिछे थे
हमें आया नहीं दामन बचाना

हवा में इन दिनों जो उड़ रहे हैं
ज़मीं पर लौट आएँ फिर बताना

गिरे पत्ते गवाही दे रहे हैं
कभी मौसम यहाँ भी था सुहाना

परिंदा क्यूँ उड़े अब आसमाँ में
उसे रास आ गया है क़ैदखाना

१०.
फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए
खुद-ब-खुद ग़ज़लों में अफ़साने तुम्हारे आ गए

हम सिखाने पर तुले थे रूह को आदाब ए दिल
पर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए

आँसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने फ़स्ल ये
क्या तअज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गए

हमको भी अपनी मुहब्बत पर हुआ तब ही यकीं
हाथ में पत्थर लिए जब लोग सारे आ गए

उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

मैंने मन की बात ’श्रद्धा’ ज्यों की त्यों रक्खी मगर
लफ्ज़ में जाने कहां से ये शरारे आ गए

११.
हँस के जीवन काटने का, मशवरा देते रहे
आँख में आँसू लिए हम, हौसला देते रहे.

धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता
बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे

जो भी होता है, वो अच्छे के लिए होता यहाँ
इस बहाने ही तो हम, ख़ुद को दग़ा देते रहे

साथ उसके रंग, ख़ुश्बू, सुर्ख़ मुस्कानें गईं
हर खुशी को हम मगर, उसका पता देते रहे

चल न पाएगा वो तन्हा, ज़िंदगी की धूप में
उस को मुझसा, कोई मिल जाए, दुआ देते रहे

मेरे चुप होते ही, किस्सा छेड़ देते थे नया
इस तरह वो गुफ़्तगू को, सिलसिला देते रहे

पाँव में जंज़ीर थी, रस्मों-रिवाज़ों की मगर
ख़्वाब ‘श्रद्धा’ उम्र-भर फिर भी सदा देते रहे