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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 21 जुलाई 2014

निखिल उन्दरकर

परिचय:
नाम: निखिल उन्दरकर
जन्म: १९/०९/१९९६
निवास स्थान: चारामा, जिला-कांकेर छत्तीसगढ़
सम्पर्क:nikku24296@gmail.com>
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ग़ज़लें 
१.                                                 
हंसकर दो लफ्ज़ जो किसी से बात कर गये
कुछ लोग हमें बेफिक्र लापरवाह समझ गये

बच्चों के साथ हम ज़रा बच्चों सा हो लिए
छोटे बच्चे भी मुझे अब बच्चा समझ गये

है गिरा क्योंकि उड़ना अभी सीख रहा है
है बाज़ का बच्चा जिसे चूज़ा समझ गये

अभी जो है अंधेरा के वक्त है नहीं सही
आएगा दिन को सूरज तुम डूबा समझ गये

नहाया है लहू से फिर भी लड़ने को राज़ी
इतनी जल्दी जिसे तुम हारा समझ गये

उसकी ज़िन्दगी की भट्ठी में जाकर आज देख
है वो ईंट पक रहा जिसे कच्चा समझ गये

आएगा दौर हम भी गूँजेंगे चारों ओर
हम आज की ये वक्त की चुप्पी समझ गये

ठोकर लगी है आज उसे यूँ न ठुकराओ
नाकाम है हुआ तुम नाकारा समझ गये

बनाने को प्यारी सी मूरत ज़िन्दगी तू गूँथ रही है
यहाँ लोग मुझे मिट्टी में मिलता समझ गये

२.
माना कि नाम अपना चारों ओर नहीं है
ये  ज़िन्दगी  है  मेरी कोई शोर नहीं है

गिरा हूँ तो इस लहज़े से भला देखते हो क्यों?
गिरकर संभलने का क्या अब  दौर  नहीं  है?

अपनों की निगाहों में भी शक देखा है हमने
लगता  है  भरोसा  दिलों  में  और नहीं  है

उबार नही सकते तो बातों का भार न बांधो
ज़िन्दगी  के  समंदर  में  रंज और  कई  हैं

डरे सहमे थे साहिल पे अब जा के ठनी है
कूदे   हैं  दरिया  में  कोई  छोर  नहीं   है

३.
कुछ शेर:

तज़ुर्बे  ये  ज़िन्दगी  के  सस्ते  न  मिले  मुझे
बहा है पानी सा इक-इक पे मेरी आँखो का मोती

जाने कौन लिख जाता है उन पन्नों पर ग़ज़लें?
आंसू जिन पर रातों को हम पोंछ दिया करते हैं

किरदार अपना रोज़ संवारता हूँ मगर
इक शख्स को मेरे चेहरे के मुहाँसे ही दिखते हैं

मेरी ग़ज़लों को मेरे ख्यालों का फितूर समझ लेना
सच्चाई  जो  जान  जाओगे  शायर  बन  जाओगे

"कैसे लिख लेते हो तुम?" ज़माना जब भी है पूछता
मैं  हैरत  में  होता  हूँ  के  उन्हें  भी  हैरत  है

है कोई जो बहाता है, मेरे लिए आँसु
किसी की आँखो से गिरा मैं, जैसे आँसु

किसी की खामोशी का शबब जानने से पहले
अक्सर बहुत कुछ कह जाया करते हैं लोग

सुलझाने जाता हूँ ज़िन्दगी के जब धागे
उलझी हुई मेरी ऊंगलियाँ लौट आती हैं

४.
तुमको मैं खामोशी से, पुकारता बार - बार  हूँ
लौट आओ, समेट लो, मैं फिर से ज़ार-ज़ार हूँ

सूखती  ज़िंदगानी  और  पतझड़  से दिन  मेरे
मुरझाया  सा दिल लेकर,  मैं खोजता बहार हूँ

जाता  हूँ  जिधर  जलने  लगती  हैं  खुशियाँ
जलती  चिता  से उठता  मैं धुँए का ग़ुबार हूँ

मुझे  ही  नहीं  मिलती  या  है  ही  नही  वहाँ
अपनों के दिलों में जो आज खोजता मैं प्यार हूँ

ऐ ज़िंदगी!  इतनी  वफा अब न कर मुझसे
के ज़िन्दा हूँ मैं खुद को समझा चुका हज़ार हूँ

तिल-तिल के  मर  रहा  हूँ  कोई  चीख  तो  सुनो
अब गिद्धों को आस-पास करते देखता इंतजार हूँ

आँखों में आ लगा है  कोई  यादों  का  तिनका
रगड़ता हुआ मैं उसको आज फिर से बेकरार हूँ

थूक-कर मुझ पर, न जाने क्या बुझाते हैं लोग?
उनको लगता है मैं  शायद  दहकता  अंगार  हूँ

रौंदने के  निशां  अब  तो  छपे  हैं  बदन  भर
छाती पर पड़े पैरों को देख खुद मैं शर्मशार हूँ

आओ के फिर से भर दो ताकत वही मुझमें
इस जंग-ए-ज़िंदगी से अब  रहा  मैं  हार हूँ

इन दिनों  खुद  से  ही  ख़फा  रहता  है  वो  "प्रेम"
तनहाईयों में सोंचता है क्या मैं इतना ही बेकार हूँ?

सब पा रहे मंज़िल और मैं लिख रहा ग़ज़ल
अब  लोग  कहते  हैं  मैं  कोई  'गंवार'  हूँ

५.
हज़ार  कोशिशें  की,  प्यार पा न सका
इक शख्स है जिसे मैं कभी भा न सका

हर  बात  हो  सही, हर  काम  हो  सही
ज़िन्दगी का ये हिसाब मुझको आ न सका

रोज़-रोज़  का  ताना  अब  जीने  नहीं  देता
पर उसने ही दी थी ज़िन्दगी, मैं मिटा न सका

मीलों का ये सफर है इसमें सैकड़ों सबक
पैदा  होते  ही  पर  पाँव, मैं  बढ़ा न सका

हर बात  पे  ये कहना उसकी  तरह  बनो
अफसोस मुझमें मैं हूँ उसे समझा न सका

काली पीठ लिए आईना ये मुझसे कहता है
अब तक तू दाग  चेहरे के  मिटा  न  सका

कहता  है  "खुशी  तुमने  मुझे  न  दी  कभी"
और ज़ख्म कैसे वो कुरेदता है, मैं बता न सका

६.
वो शख्स जब भी कभी अपने घर आता है
न किसी को जीने देता न खुद सांस ले पाता है

अपनों को समझ अपना दिल खोल दिखाता
प्यार की जगह पत्थरों से शब्द वो खाता है

दिल बार-बार उसका कुछ कहना है चहता
वो शख्स भी एसा कि अपने लब सिये जाता है

प्यास बुझाता है आँसु पीकर
वो शख्स जो आँखों में रेगिस्तां लिए जाता है

माना कि बुरा लगा पर उसकी माँ ने सच कहा
मेरे हाथ का निवाला भी तू हराम की खाता है

अच्छा हुआ कि दिल से गिरा दिया उन्होंने
नीड़ से धकेला परिन्दा उड़ना सीख जाता है

अपना रहा न कोई न अपनी कोई फिकर
मैं भी सोंचता हूँ अक्सर वो क्यों जिये जाता है

८. 
ए ज़िंदगी तुझसे लड़ने को जी करता है
है सुना किताब है तू पढ़ने को जी करता है

एक उम्र तेरे पीछे मैं दौड़ चुका हूँ
सांसो को मेरी अब थकने को जी करता है

कई रोज़ हो गये देखे तेरे सितम
तूझे क्या ज़ख्म कोई गहरा देने को जी करता है?

गिरा गिरा के हुनर तूने उठने का सिखाया
है आसमाँ छूना के फिर गिरने को जी करता है

मौत पे किसी की ज़माने का प्यार देख
दिल से सच कहूँ, मरने को जी करता है

९. 
मेरी ज़िंदगी का बस इतना फसाना है
मकान छोड़ा था पुराना ये भी छोड़ जाना है

नाम पर बदनामियों के किस्से हैं मशहूर
अल्फाज़ को ही अपनी पहचां बनाना है

मुझसे गैर होने की ग़लतफहमी लिये बैठे हैं
उनको भी किसी मोड़ पर अपना बनाना है

मरने के बाद शब्द रहें पन्नों पर ज़िन्दा
कलम को ज़िंदगी भर ज़िंदगी का ज़हर पिलाना है

ताउम्र रहूँ तन्हा गम नही कोई
अपनी मौत पे शमशां में मेला लगाना है

१०. 
ज़माना खोजता है मुझे अंकसूची की फाइलों में
मैं छिपा रहा हमेशा अपनी पुरानी डायरी में

प्यार मिला जब भी नंबरों में तौल कर
बढ़ता गया वज़न कुछ अपनी भी शायरी में

फल पकने से पहले लोग गिराते हैं मार पत्थर
सज़र जो होता है सड़कों की किनारी में

कहते हैं निकम्मा है कुछ नहीं पायेगा
आखिर कमाएगा कितना कवी की नौकरी में?

पैसों की न है भूख न शोहरत की चाह है
मैं सुकूं तलाशता हूँ ज़िंदगी की दो घड़ी में

१२.
जो कुछ भी पाया सब कुछ उसकी दुआ का था
घर  में  मेरे  बस  एक  ही  कमरा  माँ  का  था

मैंने बच्चों  के  कमरे में लगा  रखे  हैं  कूलर
माँ के कमरे में बस एक ही पंखा लगाया था

खुद  आधे  पेट  रह  खिलाती  बेटों  को  पूरा
दवा का खर्च भी बेटों ने आधा आधा उठाया था

कपड़े  नये  पहना  जो  थी  संवारती  मुझे
उसके लिए मैं बीवी की पुरानी साड़ी लाया था

एक  छींक  पे  मेरी  वो  दौड़ती  थी  अस्पताल
उसकी खाँसी पे मैंने दूर उसे खुद से बिठाया था

एक  बात  से  मुझे  भी सदमा सा है लगा
मेरे बच्चों में मैंने अपना ही रूप पाया था

बाबूजी  की  चिता  अब  तक  ठण्डी न हुइ थी
घर के बर्तन बाँटने का उन्होंने मन बनाया था

अनदेखा  कर  गुजरा  है  भाई सामने से आज
जाने क्या सोंचकर यूं उसने मुँह छिपाया था?

मेरे बच्चे  मुझसे  लड़ते  हैं ले के पक्ष उन्हीं का
उन्होंने अपने बच्चों को हमें दुश्मन बताया था

पढ़कर  मेरी  ग़ज़ल  है  वो  बौखला  गया
कहता है मुझे तुमने क्यों आईना दिखाया था?

१३.
शब्दों को तीर कलम को कमान किया जाए
फिर से नया किस्सा कोई बयान किया जाए

घर छोड़ने के दिन फिर नजदीक आ रहे
खुद के ही घर में खुद को मेहमान किया जाए

इस कदर मर रहें हैं अरमान आज-कल
दिल का कोई इक कोना शमशान किया जाए

फूलों से महकते हैं माँ बाप के सपने
जी चाहता है खुद को गुलदान किया जाए

माँ मेरी शरारतों पे मुस्कुराती है
जी चाहता है खुद को नादान किया जाए

जो हो गिला अपनों से तो भूलना वाजिब
जरूरी नहीं हर बार खड़ा तूफान किया जाए

हारकर बैठे हैं हाथ धरे क्यों?
उठो की भुजाओं को फौलाद किया जाए