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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 14 दिसंबर 2014

आचार्य बलवन्त-कवितायेँ

कवि परिचय
आचार्य बलवन्त
जन्मतिथि : 01.09.1967
जन्म स्थान : ग्राम-जूड़ी, पोस्ट- तेन्दू राबर्टसगंज, सोनभद्र-231216 (उ.प्र.)
शिक्षा : एम.ए., हिंदी
प्रकाशित कृति : आँगन की धूप (काव्य संग्रह) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड) बीकानेर
संपादन : अहिंसा तीर्थ (त्रैमासिक पत्रिका) आर.सी.बाफना गो-सेवा अनुसंधान केन्द्र, कुसुंबा, जलगांव, महाराष्ट्र (2009 से 2011) अहिंसा तीर्थ, समकालीन स्पन्दन, हिमप्रस्थ, नागफनी, सोच-विचार, साहित्य वाटिका, वनौषधिमाला आदि पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में कविताएँ और लेख प्रकाशित। आकाशवाणी जलगांव (महाराष्ट्र) और बेंगलूर से समय-समय पर काव्य रचनाएँ प्रसारित।
पत्र व्यवहार का पता-
विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस
450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053
मो. 91-9844558064 Email- balwant.acharya@gmail.com

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क्या होगा भगवान देश का!

खतरे में सम्मान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
देश में ऐसी हवा चली है,
बदल गया ईमान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
आए दिन घपला-घोटाला
दाल में है काला ही काला।
झुग्गी-झोपड़ियों के अंदर,
सिसक रहा अरमान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
बदल गयी भावों की भाषा।
बदली मूल्यों की परिभाषा।
नाम, पता और परिचय बदला,
बदल गया परिधान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
स्वार्थ की ऐसी आँधी आयी।
अपनी पीड़ा हुई परायी।
सबको अपनी-अपनी धुन है,
नहीं किसी को ध्यान देश का।
क्या होगा भगवान देश का!
मन में कोमल आशा लेकर।
अधरों पर अभिलाषा लेकर।
कब तक अपनी देह छिपाये,
चिथड़ों में ईमान देश का?
क्या होगा भगवान देश का!

बेटी
चेहरे की मुस्कान है बेटी।
घर आयी मेहमान है बेटी।
क्षमा, प्रेम, करुणा की मूरत,
ईश्वर का वरदान है बेटी।
श्रद्धा और विश्वास है बेटी।
मन की पावन प्यास है बेटी।
चहल-पहल है घर-आँगन की,
खुद में ही कुछ खास है बेटी।
सीता, सावित्री और गीता,
विविध गुणों की खान है बेटी।
जीवन की आशा है बेटी।
उज्ज्वल अभिलाषा है बेटी।
शील, समर्पण और त्याग की,
सुन्दर परिभाषा है बेटी।
हिन्दू की होली, दिवाली,
मुस्लिम की रमज़ान है बेटी।
धर्म और ईमान है बेटी,
मानवता का मान है बेटी,
स्नेह, शान्ति, सद्भाव, समन्वय,
शुचिता की पहचान है बेटी।
वेदों की ऋचा ज्योतिर्मय,
बाइबिल की आख्यान है बेटी।

तुम्हारे लिए
रौनक फ़िजा की बहारों से लेकर,
हँसी जगमगाते सितारों से लेकर,
हसरत नदी की किनारों से लेकर,
तुम्हारे लिए कुछ लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
तुम्हारे लिए ही लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
तुम्हारे लिए मन की महफ़िल सजाकर,
मन में तुम्हारी ही मूरत बसाकर,
तुम्हारी ही यादों को दिल से लगाकर,
तुम्हारे लिए कुछ लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
तुम्हारे लिए ही लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
घिरना - घुमड़ना घटाओं से लेकर,
सिहरन नदी की हवाओं से लेकर,
ये मस्ती तुम्हारी अदाओं से लेकर,
तुम्हारे लिए कुछ लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
तुम्हारे लिए ही लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
मन में मुहब्बत की लेकर रवानी,
लेकर लहर से लहर आसमानी,
दिल से लिखा हूँ, जो दिल की कहानी,
तुम्हारे लिए ही लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।
तुम्हारे लिए कुछ लिखा हूँ मैं, पढ़ लो।

शब्द कवि के नहीं होते
एक दिन
शर्मा जी
मुझे बताया,
आचार्य जी!
एक बार
मंच से
मैंने कुछ सुनाया,
मेरे पढ़ने के बाद
श्रोताओं की भीड़ से
एक आवाज़ आई,
शर्मा जी! आपने
व्याकरण की धज्जियाँ उड़ा दी।
यह सुनकर
मंचासीन एक महोदय ने टोका,
उन्हें वहीं पर रोका
और कहा-
कवि के शब्दों पर
नहीं जाना चाहिए,
क्योंकि
कवि का केवल भाव होता है,
शब्द उसके नहीं होते।

शब्दों के संकेत
अपनी आँखों पर लगे,
पूर्वाग्रह के चश्में को उतारकर,
मुझे दे दो।
फिर उसे देखो, परखो, पुकारो,
हाथों से नहीं, हृदय से उसकी आरती उतारो।
क्योंकि देखना, पहचानने की पहली शर्त है।
मार्गदर्शकों ने तुम्हें नुस्खे बतायें हैं,
सुझाव दिया है,
किन्तु तुमने उन्हें नहीं समझा,
मात्र शब्दों को शास्त्र के रूप में संग्रहित किया है।

टूटे हुए नाखून

मेरे मन की शान्ति देखकर, चेहरे का सुकून देखकर।
टेढ़ी हुईं मेरी अंगुलियाँ, टूटे हुए नाखून देखकर।
आहिस्ता समझा-समझा कर,
इतना अपने पास बुलाकर,
उसने कहा मेरे कानों में, फटी मेरी पतलून देखकर।
टेढ़ी हुईं मेरी अंगुलियाँ, टूटे हुए नाखून देखकर।
टूटा हुआ मकान देखकर,
अस्त व्यस्त सामान देखकर,
सूनी सहमी दीवारों पर, छिटका मेरा खून देखकर।
टेढ़ी हुईं मेरी अंगुलियाँ, टूटे हुए नाखून देखकर।
सजाधजा संसार देखकर,
उसमें मुझे लाचार देखकर,
दंतहीन निष्प्रभ मुख में, मैली-कुचली दातून देखकर।
टेढ़ी हुईं मेरी अंगुलियाँ, टूटे हुए नाखून देखकर।      

गाँधी के प्रति

महामना गाँधी के प्रति, वह मानवीय व्यवहार कहाँ है?
सत्य-अहिंसा के आदर्शों का आचार–विचार कहाँ है?
उनके सपनों के अपनों का आत्मीय संसार कहाँ है?
पूछ रहा हूँ, मुझे बता दो,उस चरख़े का तार कहाँ है?
रूप कहाँ है, रंग कहाँ है? 
वह ज़ीने का ढंग कहाँ है?
दौड़ पड़ी जिनके पीछे, वह चिर परिचित चीत्कार कहाँ है?
पूछ रहा हूँ, मुझे बता दो,उस चरख़े का तार कहाँ है?
लकुटी के संग देश कहाँ है?
मुट्ठी का आवेश कहाँ है?
साबरमती का वह संरक्षक, पड़ा हुआ लाचार कहाँ है?
पूछ रहा हूँ, मुझे बता दो,उस चरख़े का तार कहाँ है ?
गंध कहाँ है ? गीत कहाँ है?
इसमें अपनी जीत कहाँ है?
जिसने कर्मयोग सिखलाया, वह गीता का सार कहाँ है ?
पूछ रहा हूँ, मुझे बता दो,उस चरख़े का तार कहाँ है ?


कार्य करने की कला 

हर व्यक्ति कुछ करना चाहता है,
कर नहीं पाता,
क्योंकि उसे करने ही नहीं आता। 
बनना चाहता है हिमालय, 
किन्तु तूफानी हवाएं उड़ा ले जाती हैं 
रेत के एक-एक कण को,
महल बनने से पहले ही ढह जाता है,
आदमी ठगा-ठगा रह जाता है। 
संस्कार की हर श्रृंखला 
उसे बार-बार रोकती है, 
झंझावातों के मेले में, 
आदमी अकेले में कहाँ रह पाता है?
निषेधों के प्रहार, 
सहते-सहते बार-बार 
जीवन ठूँठ ही रह जाता है,
जो भी व्यक्ति उस गीत को,
अनूठी प्रतीति को, 
जानता है, पहचानता है,
वह भी तो नहीं बता पाता है। 
सुनना समझने की पहली शर्त है,
किन्तु गौतम के उपदेश को,
गाँधी के संदेश को,
व्यक्ति कहाँ सुन पाता है ?
सुनता है वही, 
जो उसे जँचता है, भाता है,
सुनता है वही, 
जो उसे सुनने आता है। 


मैं समय हूँ ? 

मैं कौन हूँ, इसे वही बता सकता है, 
जिसने मैं को जिया हो,
मैं को चखा हो, मैं को पिया हो।
मैं कौन हूँ ? इसे मैं जानता हूँ,
मैं को ‘मैं’ पहचानता हूँ,
मेरी पहचान औरों से नहीं है, 
अपनी पहचान मैं स्वयं को मानता हूँ।
मैं ही मूल हूँ विस्तार का,
बनते-बिगड़ते आकार का,
दिन-रात तो मेरी प्रवृत्तियों के प्रक्षेपण हैं,
मैं रुकता नहीं, अनवरत चलता हूँ, 
मैं मिटता नहीं, बदलता हूँ,
मैं टूटता नहीं, पिघलता हूँ,
मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समय हूँ।
मैं कृष्ण हूँ, क्राइस्ट हूँ, राम हूँ, 
अद्वैत हूँ, अनाम हूँ।
तीर्थ हूँ, धाम हूँ, 
मैं ही मैं का आयाम हूँ । 
मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समय हूँ।

अपना प्रकाश बटोरे रहें 

हे सूर्यदेव !
अभी आप अपना प्रकाश बटोरे रहें,
क्योंकि सृजन हो रहा है।
शिल्पविधान रचा जा रहा है,
नखत जहाँ के तहाँ स्थिर हो गये हैं,
मांगलिक वेदियाँ मंत्रों से भरी पड़ी हैं,
अस्तित्व हर तरफ गा रहा है।
मेरी रात तो स्वयं उजली है,
इसलिए हे दिनेश ! 
अभी आप अपना प्रकाश बटोरे रहें।
क्योंकि जो कार्य मैं कर रहा हूँ,
आप नहीं कर सकते।
जब लक्ष्मण को शक्ति लगी थी,
भाई की भुजा कटी थी,
भाई की भुजा कटने पर एक बार पहले भी-
मैंने आपको रोका था, समझाया था, 
सावधान किया था,
क्योंकि आपने व्यतिक्रम/व्यवधान किया था।
मैंने कहा था कि दिन होते ही हाहाकार मचेगी,
प्रलय हो जायेगी, धरती नहीं सह पायेगी,
फिर कौन करेगा तुम्हारी परिक्रमा?
इसलिए हे दिनेश! 
अभी आप अपना प्रकाश बटोरे रहें।


आँखें

हम किसी को देखते हैं
तो सिर्फ उसकी आँखों की वजह से।
किसी का चेहरा उसी की आँखें हैं,
और उसके चेहरे पर उसी के आँखों की ही खूबसूरती है।
आँखों के सिवाय चेहरे में कुछ नहीं रखा है।
आँखें आपके दिल की जुबान हैं,
जो दिल के गहरे राज को खोलती हैं।
कभी-कभी आप नहीं बोलते, 
आपकी आँखें बोलती हैं।
आपके चेहरे पर जो निखार है
वो कुछ और नहीं, 
आपकी आँखों का ही चमत्कार है।

उम्मींदों की आशा हिन्दी

जन सामान्य की भाषा हिन्दी।
जन–मन की जिज्ञासा हिन्दी।
जन–जीवन में रची बसी
बन जीवन की अभिलाषा हिन्दी।
तुलसी-सूर की बानी हिन्दी।
विश्व की जन कल्याणी हिन्दी।
ध्वनित हो रही घर–आँगन में
बनकर कथा – कहानी हिन्दी।
संकट के इस विषम दौर में
उम्मींदों की आशा हिन्दी।
गीत प्रेम के गाती हिन्दी।
सबको गले लगाती हिन्दी।
प्रेम – भाव से जीने का
मन में उल्लास जगाती हिन्दी।
प्रेम–भाव से करती, सबके
मन की दूर निराशा हिन्दी।
गीत राष्ट्र के गानेवाले।
हँसकर शीश कटानेवाले।
मातृभूमि की रक्षाहित
अपना सर्वस्व लुटानेवाले।
राष्ट्रधर्म पर मिटनेवाले
वीरों की है गाथा हिन्दी।
सेवा भाव सिखाती हिन्दी।
सबके मन को भाती हिन्दी।
सबके दिल की बातें करती
सबका दिल बहलाती हिन्दी।
स्नेह, शील, सद्भाव, समन्वय
संयम की परिभाषा हिन्दी।