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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 15 दिसंबर 2014

डॉ सुधेश

परिचय: हिन्दी के कवि ,आलोचक ,संस्मरण एवं यात्रावृत्तान्त लेखक ,दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प़ोफेसर (सेवा निवृत्त ) 
प्रकाशन: दस काव्य संग़ह ,दस आलोचनात्मक पुस्तकें तीन यात्रा वृत्तान्त,,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास ,एक आत्म कथा (प़थम खण्ड ) अंग़ेज़ी में लिखित निबन्ध संग़ह Reflections on Hindi literature (प़काश्य ) उर्दू ,अंग़ेज़ी की चयनित कविताएँ ,निबन्ध हिन्दी में अनूदित , पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
सम्पर्क सूत्र: फ़ोन ०९३५०९७४१२० ईमेल drsudhesh@gmail.com
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प्रस्तुत हैं कुछ उत्कृष्ट ग़ज़लें 
१. 
रोना है तो छुप कर रो
हँसना हो तो खुल कर हो ।

यदि फूलों का प्रेमी है
शूलों की खेती मत बो ।

सब की नफ़रत है मरना
जीना है तो सब का हो ।

मरने पर दुनिया रोये
मरना तो बस ऐसा हो ।

मन का मैल मिटेगा बस
आँखों के पानी से धो ।

२.
मुहब्बतें ही यहाँ मुहब्बतें मुहब्बतें
ज़िन्दगी की यही हैं राहतें राहतें ।

बनाओगे कब तक यों दुनिया को दोज़ख़
चलेंगी कहाँ तक ये नफरतें नफरतें ।

उम़ भर आरज़ू का सफ़र चलचलाचल
आख़िरी वक़्त भी बची हसरतें हसरतें ।

उम्र भर पालते ही रहे दुश्मनी को
मरने के बाद ज़िन्दा रहीं ये चाहतें ।

नहीं वक़्त लगता है रुसवाई में तो
यहाँ मरने पर ही मिलती हैं इज़्ज़त्तें ।

३.
पीपल के नीचे दिया जले
विरहन का मानो जिया जले ।

जो किसी याद में खोई सी
मेरी आँखों में दिया जले ।

रावण लंका में गरज रहा
उपवन में बैठी सिया जले ।

प़ीतम विदेश में खटता है
घर में घुटती राबिया जले ।

जंगल में घोर अंधेरे को
आलोकित करने दिया जले ।

पीपल पर भूतों का डेरा
क्या उन्हें भगाने दिया जले ।।

पीपल पर दुबके हैं पंछी
उन को शंका आशियाँ जले ।

दीपक से आग चुरा कर के
पटना राँची हल्दिया जले । ।

४.
कहनी जो तुम से बात अकेले में
मुझ से होगी वह बात न मेले में ।

यह लाखों का मौसम है सावन का
कैसे इस को तोलूं मैं धेले में ?

दुनिया बाज़ार हुई सच है फिर भी
यह प्यार कहाँ बिकता है ठेले में ?

रक्तिम कपोल तेरे यह कहते हैं
अंधरों ने छापी बात अकेले में ।

सब सुन लें कैसे ऐसी ग़ज़ल कहूँ
जग के गूँगे बहरों के मेले में ।

५.
इतनी आफतों की आहटें हैं
लो आ गई अब तो आफतें हैँ ।

कितनी मुश्किलें हैं ज़िन्दगी में
जीवन में न जितनी चाहतें हैँ ।

किस को शेख बहकाते रहे हो
दोज़ख़ यहीं पर तो जन्नतें़ हैं ।

जितनी आप को आसानियाँ हैं
उतनी सैंकड़ों को मुश्किलें हैं ।

शायद आ गया महबूब मेरा
देखो पाँव की कुछ आहटें हैँ ।

सारी रात कोई सो न पाया
योँ ही बिस्तरे में सलवटें हैँ ।

इतनी रात को यह कौन आया
किस की द्वार पर ये दस्तकें हैँ ।