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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

जतिन्दर परवाज

जन्म -२५ फरबरी १९७५ को पंजाब पठानकोट के पास के एक गाँव शाहपुर कंडी पंजाब में।

१.
ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ
मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ


फूल से जिस्म चाँद से चेहरे
तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ


तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी
हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ


ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता
था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ


शाम तक तो नगर सलामत था
हो गया रात भर में क्या क्या कुछ


हम से पूछो न ज़िंदगी 'परवाज़'
थी हमारी नज़र में क्या क्या कुछ


२.
बारिशों में नहाना भूल गए
तुम भी क्या वो ज़माना भूल गए

कम्प्यूटर किताबें याद रहीं
तितलियों का ठिकाना भूल गए

फल तो आते नहीं थे पेडों पर
अब तो पंछी भी आना भूल गए

यूँ उसे याद कर के रोते हैं
जैसे कोई ख़जाना भूल गए

मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा
तुम भी अब मुस्कराना भूल गये


३.
गुमसम तनहा बैठा होगा
सिगरट के कश भरता होगा


उसने खिड़की खोली होगी
और गली में देखा होगा


ज़ोर से मेरा दिल धड़का है
उस ने मुझ को सोचा होगा


सच बतलाना कैसा है वो
तुम ने उस को देखा होगा


मैं तो हँसना भूल गया हूँ
वो भी शायद रोता होगा


ठंडी रात में आग जला कर
मेरा रास्ता तकता होगा


अपने घर की छत पे बेठा
शायद तारे गिनता होगा


४.
आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं
छोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहीं


गुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछें
इतना भी संजीदा होना ठीक नहीं


कुछ और सोच ज़रीया उस को पाने का
जंतर-मंतर जादू-टोना ठीक नहीं


अब तो उस को भूल ही जाना बेहतर है
सारी उम्र का रोना-धोना ठीक नहीं


मुस्तक़बिल के ख़्वाबों की भी फिक्र करो
यादों के ही हार पिरोना ठीक नहीं


दिल का मोल तो बस दिल ही हो सकता है
हीरे-मोती चाँदी-सोना ठीक नहीं


५.
मुझको खंजर थमा दिया जाए
फिर मेरा इम्तिहाँ लिया जाए

ख़त को नज़रों से चूम लूँ पहले
फिर हवा में उड़ा दिया जाए

तोड़ना हो अगर सितारों को
आसमाँ को झुका लिया जाए

जिस पे नफरत के फूल उगते हों
उस शजर को गिरा दिया जाए

एक छप्पर अभी सलामत है
बारिशों को बता दिया जाए

सोचता हूँ के अब चरागों को
कोई सूरज दिखा दिया जाए


६.
सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र ख़ून में तर
शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर


तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है
तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर


बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के
बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल की धरती पर


आ भी जा अब जाने वाले कुछ इन को भी चैन पड़े
कब से तेरा रस्ता देखें छत आँगन दीवार-ओ-दर


जिस की बातें अम्मा अब्बू अक्सर करते रहते हैं
सरहद पार न जाने कैसा वो होगा पुरखों का घर


७.
शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुभने लगा है


नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है


कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है


सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है


जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है


चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है


८.
यार पुराने छूट गए तो छूट गए
काँच के बर्तन टूट गए तो टूट गए

सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं
तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए

शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे
मेरे सपने टूट गए तो टूट गए

इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये
भाग किसी के फूट गए तो फूट गए

छोड़ो रोना धोना रिश्ते नातों पर
कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए

अब के बिछड़े तो मर जाएँगे 'परवाज़'
हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए

९.
ज़रा सी देर में दिलकश नज़ारा डूब जायेगा
ये सूरज देखना सारे का सारा डूब जायेगा


न जाने फिर भी क्यों साहिल पे तेरा नाम लिखते हैं
हमें मालूम है इक दिन किनारा डूब जायेगा


सफ़ीना हो के हो पत्थर हैं हम अंजाम से वाक़िफ़
तुम्हारा तैर जायेगा हमारा डूब जायेगा


समन्दर के सफ़र में क़िस्मतें पहलू बदलती हैं
अगर तिनके का होगा तो सहारा डूब जायेगा


मिसालें दे रहे थे लोग जिसकी कल तलक हमको
किसे मालूम था वो भी सितारा डूब जायेगा


१०.
यों ही उदास है दिल बेकरार थोड़ी है
मुझे किसी का कोई इंतज़ार थोड़ी है

नज़र मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे
तुम्हारे दिल पे मेरा इख़्तियार थोड़ी है

मुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न हो
हमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है

ख़िज़ा ही ढूँढ़ती रहती है दर-ब-दर मुझको
मेरी तलाश मैं पागल बहार थोड़ी है

न जाने कौन यहाँ साँप बन के डस जाए
यहाँ किसी का कोई ऐतबार थोड़ी है


११.
वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है
मुहब्बत का पहला असर काटता है

मुझे घर में भी चैन पड़ता नही था
सफ़र में हूँ अब तो सफ़र काटता है

ये माँ की दुआएँ हिफाज़त करेंगी
ये ताबीज़ सब की नज़र काटता है

तुम्हारी जफ़ा पर मैं ग़ज़लें कहूँगा
सुना है हुनर को हुनर काटता है

ये फिरका-परसती ये नफ़रत की आँधी
पड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता है