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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 19 जनवरी 2013

अख़्तर-उल-ईमान


जन्म: 12 नवंबर 1915,निधन: 1996,कुछ प्रमुख कृतियाँ-तारीक सय्यारा (1943), गर्दयाब (1946), आबजू (1959), यादें (1961), बिंत-ए-लम्हात (1969), नया आहंग (1977), सार-ओ-सामान

१.

आती नहीं कहीं से दिल-ए-ज़िन्दा की सदा 
सूने पड़े हैं कूचा-ओ-बाज़ार इश्क़ के 


है शम-ए-अंजुमन का नया हुस्न-ए-जाँ गुदाज़[2]
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले[3] 

ताज़ा न रख सकेगी रिवायात-ए-दश्त-ओ-दर
वो फ़ित्नासर[4] गए जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएँ हम
आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मुहब्बत मनाएँ हम

सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें 

क्या जाने अब न उल्फ़त-ए-देरीना[5] याद आए
इस हुस्न-ए-इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें 

बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
संभले हुए तो हैं पर ज़रा डगमगा तो लें ।

शब्दार्थ:
प्रेम की मृत्यु का महोत्सव
पिघलता हुआ
उत्साह उमंग
पाग़ल
पुरातन प्रेम

२.
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

बायस-ए-रश्क़ है तन्हा रवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंज़िल के सिवा

हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा

तेग़ मुन्सिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर मे क़ातिल के सिवा

ज़ाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़मा ही नही शोर-ए-सिलासिल के सिवा

३.


फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब 
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग-ए-लाज़वाल 

फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला-सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन-ए-शब में उदास 

फिर वो उम्मीदों के मदफ़न[1] ज़िंदगी के आस-पास
फिर वही फ़र्दा[2] की बातें फिर वही मीठे सराब[3] 

फिर वही बेदार[4] आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब
फिर वही वारफ़्तगी[5] तन्हाई अफ़सानों का खेल 

फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह
फिर वही शहर-ए-तमन्ना फिर वही तारीक राह 

ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल
दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी 

मुझ से मेरी आरज़ू-ए-दीद भी छिनने लगी
फिर वही तारीक[6] माज़ी फिर वही बेकैफ़[7] हाल 

फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब

शब्दार्थ:
मक़बरा समाधि
आने वाला कल भविष्य
भ्रम
निद्राविहीन
ख़ुद अपने आप में खोया हुआ
काला अँधेरा
उमंगहीन जीवनहीन

४.

तुम्हारे लहजे में जो गर्मी-ओ-हलावत[1] है
इसे भला सा कोई नाम दो वफ़ा की जगह 

गनीम[2]-ए-नूर का हमला कहो अँधेरों पर
दयार-ए-दर्द में आमद[3] कहो मसीहा की 

रवाँ-दवाँ[4] हुए ख़ुशबू के क़ाफ़िले हर सू
ख़ला-ए-सुबह[5] में गूँजी सहर की शहनाई 

ये एक कोहरा सा ये धुँध सी जो छाई है
इस इल्तहाब[6] में सुर्मगीं[7] उजाले में 

सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नज़र नहीं आता
हयात नाम है यादों का तल्ख़ और शीरीं 

भला किसी ने कभी रन्ग-ओ-बू को पकड़ा है
शफ़क़[8] को क़ैद में रखा सबा को बन्द किया

हर एक लमहा गुरेज़ाँ[9] है जैसे दुश्मन है
न तुम मिलोगी न मैं हम भी दोनों लम्हे हैं
वो लम्हें जाके जो वापस कभी नहीं आते

शब्दार्थ:
मिठास आत्मीयता
दुश्मन
आगमन
फैली हुई बिखरी हुई
सुबह की शान्ति
उदासीनता निराशा
सुरमई
झुटपुटा
भागना पलायन करना

५.