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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

अमीर ख़ुसरो


१.
ज़े हल-ए मिस्कीं मकुन तगाफुल दुराए नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए हिज्राँ नदारम ऐ जां न लीहो कहे लगाए छातियां

शाबान-ए हिज्राँ दराज़ चू ज़ुल्फ़-व- रोज़-ए- वसलत चु उम्र कोतह
सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

यका यक अज़ दिल दो चश्म जादू बसद फरेबम बबुर्द तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियां

चू शम्माँ सोज़ां चू ज़र्रा हैरां हमेशा गिरयां बइश्क-ए आं मह

न नींद नैना न अंग चैना न आप आवें न भेजें पतियांब हक्क़-ए रोज़-ए विसाल-ए दिलबर कि दाद मारा फ़रेब ख़ुसरो
सपीद मन कों दुराए राखूं जो जां पाऊँ पिया कि घतियाँ