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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

तसलीम फ़ाज़ली


१.
रफ़्ता रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गये
पहले जान फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गये
 
दिन-ब-दिन बड़ने लगी उस हुस्न की रानाईयाँ
पहले गुल फिर गुल-बदन फिर गुल-बदामाँ हो गये
 
आप तो नज़दीक से नज़दीक-तर आते गये
पहले दिल फिर दिल-रुब फिर दिल के मेहमाँ हो गये
 
२.
आप को भूल जायें हम इतने तो बेवफ़ा नहीं
आप से क्या गिला करें आप से कुछ गिला नहीं
 
शीशा-ए-दिल को तोड़ना उनका तो एक खेल है
हमसे ही भूल हो गई उनकी कोई ख़ता नहीं
 
काश वो अपने ग़म मुझे दे दें तो कुछ सुकूँ मिले
वो कितना बदनसीब है ग़म ही जिसे मिला नहीं
 
करना है गर वफ़ा तो क्या कैसे वफ़ा को छोड़ दूँ
कहते हैं इस गुनाह की होती कोई सज़ा नहीं