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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

नासिर काज़मी


जन्म: 08 दिसंबर 1925. निधन: 02 मार्च 1972. जन्म स्थान, अंबाला, पंजाब.
१.

गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया, किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो

बस एक मोती सी छब दिखाकर, बस एक मीठी सी धुन सुनाकर
सितारए-शाम बनके आया, ब'रंगे-ख्वाबे-सेहर गया वो

खुशी की रुत हो के गम का मौसम, नज़र उसे ढूंडती है हरदम
वो बूए-गुल था के नग्मए-जाँ, मेरे तो दिल में उतर गया वो

न अब वो यादों का चढ़ता दर्या, न फुर्सतों की उदास बरखा
युंही ज़रा सी कसक है दिल में, जो ज़ख्म गहरा था भर गया वो

कुछ अब संभलने लगी है जाँ भी, बदल चला रंगे-आसमां भी
जो रात भारी थी टल गई है, जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो

शिकस्तः-पा राह में खडा हूँ, गए दिनों को बुला रहा हूँ
जो क़ाफला मेरा हमसफ़र था, मिसाले-गरदे-सफर गया वो

हवस की बुनियाद पर न ठहरा, किसी भी उम्मीद का घरौंदा
चली जरा सी हवा मुखालिफ़, गुबार बनकर बिखर गया वो

वो मयकदे को जगाने वाला, वो रात की नींद उडाने वाला
ये आज क्या उसके जी में आई, के शाम होते ही घर गया वो

वो जिसके शाने पे हाथ रखकर, सफ़र किया तूने मंज़िलों का
तेरी गली से, न जाने क्यों, आज सर झुकाए गुज़र गया वो

वो हिज्र की रात का सितारा, वो हमनवा हमसुखन हमारा
सदा रहे नाम उसका प्यारा, सुना है कल रत मर गया वो

वो रात का बेनवा मुसाफिर, वो तेरा शायर वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा था, फिर न जाने किधर गया वो

२.

कुछ यादगारे-शहरे-सितमगर ही ले चलें
आए हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें

यूं किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र
सर पर खयाले-यार की चादर ही ले चलें

ये कह के छेड़ती है हमें दिल-गिरफ्त्गी
घबरा गए हैं आप तो बाहर ही ले चलें

इस शहरे-बेचराग में जायेगी तू कहाँ
आ ऐ शबे- फिराक तुझे घर ही ले चलें

.

आराइशे-ख़याल भी हो दिल-कुशा भी हो
वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो

ये क्या के रोज़ एक सा गम एक सी उम्मीद
इस रंजे-बेखुमार की अब इन्तेहा भी हो

टूटे कभी तो हुस्ने-शबो-रोज़ का तिलिस्म
इतने हुजूम में कोई चेहरा नया भी हो

दीवानगी-ए-शौक़ को ये धुन है इन दिनों
घर भी हो और बे-दरो-दीवार सा भी हो

जुज़ दिल कोई मकान नहीं दह्र में जहाँ
रहज़न का खौफ भी न रहे दर खुला भी हो

हर शय पुकारती है पसे-परदए- सुकूत
लेकिन किसे सुनाऊं कोई हमनवा भी हो

४.

जुर्मे-उम्मीद की सज़ा ही दे
मेरे हक में भी कुछ सुना ही दे

इश्क में हम नहीं ज़ियादा तलब
जो तेरा नाज़े-कम-निगाही दे

तूने तारों से शब की मांग भरी
मुझको इक अश्के-सुब्ह-गाही दे

बस्तियों को दिए हैं तूने चराग
दस्ते-दिल को भी कोई राही दे

उम्र भर की नवागरी का सिला
ऐ खुदा कोई हमनवा ही दे

ज़र्दरू हैं वरक ख्यालों के
ऐ शबे-हिज्र कुछ सियाही दे

गर मजाले-सुखन नहीं नासिर
लबे-खामोश से गवाही दे

५.

इन सहमे हुए शहरों की फजा कुछ कहती है
कभी तुम भी सुनो, ये धरती क्या कुछ कहती है

ये ठिठरी हुई लम्बी रातें कुछ पूछती हैं
ये खामोशी आवाज़नुमा कुछ कहती है

सब अपने घरों में लम्बी तान के सोते हैं
और दूर कहीं कोयल की सदा कुछ कहती है

कभी भोर भए, कभी शाम पड़े, कभी रात गए
हर आन बदलती रुत की हवा कुछ कहती है

नासिर आशोबे- ज़माना से गाफ़िल न रहो
कुछ होता है जब ख़ल्के-खुदा कुछ कहती है

६.

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है “नासिर”
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

७.

होती है तेरे नाम से वहशत[1] कभी-कभी
बरहम[2]हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी

दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी

जोश-ए-जुनूँ[3] में दर्द की तुग़यानियों[4] के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन[5] न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त[6] कभी-कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत[7] के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी


शब्दार्थ:
  1. ↑ चिन्ता
  2. ↑ बैचेन
  3. ↑ उन्माद
  4. ↑ तूफ़ान
  5. ↑ संतुष्ट
  6. ↑ जुदाई की रात
  7. ↑ प्रेम का परित्याग
८.
हुस्न को दिल में छुपा कर देखो
ध्यान की शमा जला कर देखो

क्या खबर कोई दफीना मिल जाये
कोई दीवार गिरा कर देखो

फाख्ता चुप है बड़ी देर से क्यूँ
सरो की शाख हिला कर देखो

नहर क्यूँ सो गई चलते-चलते
कोई पत्थर ही गिरा कर देखो

दिल में बेताब हैं क्या-क्या मंज़र
कभी इस शहर में आ कर देखो

इन अंधेरों में किरन है कोई
शबज़दों आंख उठाकर देखो


९.




१२.
मुसलसल बेकली दिल को रही है
मगर जीने की सूरत तो रही है

मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा-मारा
ये बस्ती चैन से क्यों सो रही है

चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर
ये नगरी आज ख़ाली हो रही है

न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ
ख़िज़ाँ पत्तों में छुप के रो रही है

हमारे घर की दीवारों पे “नासिर”
उदासी बाल खोले सो रही है


१४.

मुमकिन नहीं मता-ए-सुख़न मुझ से छीन ले
गो बाग़बाँ ये कंज-ए-चमन मुझ से छीन ले

गर एहतराम-ए-रस्म-ए-वफ़ा है तो ऐ ख़ुदा
ये एहतराम-ए-रस्म-ए-कोहन मुझ से छीन ले

मंज़र दिल-ओ-निगाह के जब हो गये उदास
ये बे-फ़ज़ा इलाक़ा-ओ-तन मुझ से छीन ले

गुलरेज़ मेरी नालाकशी से है शाख़-शाख़
गुलचीँ का बस चले तो ये फ़न मुझ से छीन ले

सींची हैं दिल के ख़ून से मैं ने ये क्यारियाँ
किस की मजाल मेरा चमन मुझ से छीन ले


१४.
फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आये

फिर कुँजें बोलीं घास के हरे समन्दर में
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आये

फिर कागा बोला घर के सूने आँगन में
फिर अम्रत रस की बूँद पड़ी तुम याद आये

पहले तो मैं चीख़ के रोया फिर हँसने लगा
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आये

दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आये

१५.

फिक्र-ए-तामीर-ए-आशियाँ भी है
खौफ-ए-बे माहरी-ए-खिजाँ भी है

खाक भी उड़ रही है रास्तों में
आमद-ए-सुबह-ए-समाँ भी है

रंग भी उड़ रहा है फूलों का
गुंचा-गुंचा सर्द-फसाँ भी है

ओस भी है कहीं-कहीं लरज़ाँ
बज़्म-ए-अंजुमन धुआँ-धुआँ भी है

कुछ तो मौसम भी है ख़याल अंगेज़
कुछ तबियत मेरी रवाँ भी है

कुछ तेरा हुस्न भी है होश-रुबा
कुछ मेरी शौकी-ए-बुताँ भी है

हर नफ्स शौक भी है मंजिल का
हर कदम याद-ए-रफ्तुगाँ भी है

वजह-ए-तस्कीं भी है ख़याल उसका
हद से बढ़ जाये तो गिराँ भी है

ज़िन्दगी जिस के दम से है नासिर
याद उसकी अज़ाब-ए-जाँ भी है


१६.
नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं

आज देखा है तुझे देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाये कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं

आरज़ू है के तू यहाँ आये
और फिर उम्र भर न जाये कहीं

जी जलाता हूँ और ये सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाये कहीं

आओ कुछ देर रो ही लें “नासिर”
फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं


१७.
“नासिर” क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है
दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है

कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जायेगा
रूखी-सूखी जो मिल जाये शुक्र करो तो बेहतर है

कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जायेगा लहू
नाम-ए-ख़ुदा हो जवाँ अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है

क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं
अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है

कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिये
रात बहुत काली है “नासिर” घर में रहो तो बेहतर है


१८.
नये कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिये
वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये

जिस धूप की दिल को ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
इन जलती बुझती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिये

वो शहर में था तो उस के लिये औरों से मिलना पड़ता था
अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिये

अब शहर में इस का बादल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुलदान सजाऊँ किस के लिये

मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
इन ख़ाली कमरों में “नासिर” अब शम्मा जलाऊँ किस के लिये


१९.
दुख की लहर ने छेड़ा होगा
याद ने कंकड़ फेंका होगा

आज तो मेरा दिल कहता है
तू इस वक़्त अकेला होगा

मेरे चूमे हुए हाथों से
औरों को ख़त लिखता होगा

भीग चलीं अब रात की पलकें
तू अब थक कर सोया होगा

रेल की गहरी सीटी सुन कर
रात का जंगल गूँजा होगा

शहर के ख़ाली स्टेशन पर
कोई मुसाफ़िर उतरा होगा

आँगन में फिर चिड़ियाँ बोलें
तू अब सो कर उठा होगा

यादों की जलती शबनम से
फूल सा मुखड़ा धोया होगा

मोती जैसी शक़्ल बनाकर
आईने को तकता होगा

शाम हुई अब तू भी शायद
आपने घर को लौटा होगा

नीली धुंधली ख़ामोशी में
तारों की धुन सुनता होगा

मेरा साथी शाम का तारा
तुझ से आँख मिलाता होगा

शाम के चलते हाथ ने तुझ को
मेरा सलाम तो भेजा होगा

प्यासी कुर्लाती कून्जूँ ने
मेरा दुख तो सुनाया होगा

मैं तो आज बहुत रोया हूँ
तू भी शायद रोया होगा

“नासिर” तेरा मीत पुराना
तुझ को याद तो आता होगा

२०.

दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी

भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी

तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी

शहर की बेचिराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी

सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी

वक़्त अच्छा भी आयेगा ‘नासिर’
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी


२१.
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में “नासिर”
हम बहुत रोये वो जब याद आया


२२.
तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं

बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं

यहाँ तक बढ़ गये आलाम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं

कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं

निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं

जिन्हें हम देख कर जीते थे “नासिर”
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं


२३.
तू है या तेरा साया है
भेस जुदाई ने बदला है

दिल की हवेली पर मुद्दत से
ख़ामोशी का क़ुफ़्ल पड़ा है

चीख़ रहे हैं ख़ाली कमरे
शाम से कितनी तेज़ हवा है

दरवाज़े सर फोड़ रहे हैं
कौन इस घर को छोड़ गया है

हिचकी थमती ही नहीं ‘नासिर’
आज किसी ने याद किया है


२४.
ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद

कौन घूंघट उठाएगा सितमगर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद

हाथ उठते हुए उनके न देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद

फिर ज़माना-ए-मुहब्बत की न पुरसिश होगी
रोएगी सिसकियाँ ले-ले के वफ़ा मेरे बाद

वो जो कहता था कि ‘नासिर’ के लिए जीता हूं
उसका क्या जानिए, क्या हाल हुआ मेरे बाद


२५.
ज़बाँ सुख़न को सुख़न बाँकपन को तरसेगा
सुख़नकदा मेरी तर्ज़-ए-सुख़न को तरसेगा

नये प्याले सही तेरे दौर में साक़ी
ये दौर मेरी शराब-ए-कोहन को तरसेगा

मुझे तो ख़ैर वतन छोड़ के अमन न मिली
वतन भी मुझ से ग़रीब-उल-वतन को तरसेगा

उन्हीं के दम से फ़रोज़ाँ हैं मिल्लतों के चराग़
ज़माना सोहबत-ए-अरबाब-ए-फ़न को तरसेगा

बदल सको तो बदल दो ये बाग़बाँ वरना
ये बाग़ साया-ए-सर्द-ओ-समन को तरसेगा

हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
ज़मीं पानी को सूरज किरन को तरसेगा


२६.
गिरिफ़्ता-दिल हैं बहुत आज तेरे दीवाने
ख़ुदा करे कोई तेरे सिवा न पहचाने

मिटी-मिटी सी उम्मीदें थके-थके से ख़याल
बुझे-बुझे से निगाहों में ग़म के अफ़साने

हज़ार शुक्र के हम ने ज़ुबाँ से कुछ न कहा
ये और बात के पूछा न अहल-ए-दुनिया ने

बक़द्र-ए-तश्नालबी पुर्सिश-ए-वफ़ा न हुई
छलक के रह गये तेरी नज़र के पैमाने

ख़याल आ गया मायूस रहगुज़ारों का
पलट के आ गये मंज़िल से तेरे दीवाने

कहाँ है तू के तेरे इंतज़ार में ऐ दोस्त
तमाम रात सुलगते रहे दिल के वीराने

उम्मीद-ए-पुर्सिश-ए-ग़म किस से कीजिये “नासिर”
जो मेरे दिल पे गुज़रती है कोई क्या जाने


२७.
कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले
दिल का ये हाल कहाँ था पहले

अब तो मन्ज़िल भी है ख़ुद गर्म-ए-सफ़र
हर क़दम संग-ए-निशाँ था पहले

सफ़र-ए-शौक़ के फ़रसंग न पूछ
वक़्त बेक़ैद-ए-मकां था पहले

ये अलग बात कि ग़म रास है अब
इस में अंदेशा-ए-जाँ था पहले

यूँ न घबराये हुये फिरते थे
दिल अजब कुंज-ए-अमाँ था पहले

अब भी तू पास नहीं है लेकिन
इस क़दर दूर कहाँ था पहले

डेरे डाले हैं बगुलों ने जहाँ
उस तरफ़ चश्म-ए-रवाँ था पहले

अब वो दरिया न बस्ती न वो लोग
क्या ख़बर कौन कहाँ था पहले

हर ख़राबा ये सदा देता है
मैं भी आबाद मकाँ था पहले

क्या से क्या हो गई दुनिया प्यारे
तू वहीं पर है जहाँ था पहले

हम ने आबाद किया मुल्क-ए-सुख़न
कैसा सुनसान समाँ था पहले

हम ने बख़्शी है ख़मोशी को ज़ुबाँ
दर्द मजबूर-ए-फ़ुग़ाँ था पहले

हम ने रोशन किया मामूर-ए-ग़म
वरना हर सिम्त धुआँ था पहले

ग़म ने फिर दिल को जगाया “नासिर”
ख़ानाबरबाद कहाँ था पहले


२८.
किसे देखें कहाँ देखा न जाये
वो देखा है जहाँ देखा न जाये

मेरी बरबादियों पर रोने वाले
तुझे महव-ए-फुगाँ देखा न जाये

सफ़र है और गुरबत का सफ़र है
गम-ए-सद-कारवाँ देखा न जाये

कहीं आग और कहीं लाशों के अंबार
बस ऐ दौर-ए-ज़मीँ देखा न जाये

दर-ओ-दीवार वीराँ, शमा मद्धम
शब-ओ-गम का सामाँ देखा न जाये

पुरानी सुहब्बतें याद आती है

चरागों का धुआँ देखा न जाये

भरी बरसात खाली जा रही है

सराबर-ए-रवाँ देखा न जाये

कहीं तुम और कहीं हम, क्या गज़ब है

फिराक-ए-जिस्म-ओ-जाँ देखा न जाये

वही जो हासिल-ए-हस्ती है नासिर
उसी को मेहरबाँ देखा न जाये


२९.
किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे
गुज़र गई जरस-ए-गुल उदास कर के मुझे

मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में
जगा के छोड़ गये क़ाफ़िले सहर के मुझे

मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में
उड़ा के ले गया जादू तेरी नज़र का मुझे

मैं तेरी दर्द की तुग़ियानियों में डूब गया
पुकारते रहे तारे उभर-उभर के मुझे

तेरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी
मज़े मिले इन्हीं रातों में उम्र भर के मुझे

ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म-ए-दुनिया
बुला रहा है कोई बाम से उतर के मुझे

फिर आज आई थी इक मौज-ए-हवा-ए-तरब
सुना गई है फ़साने इधर-उधर के मुझे


३०.
आज तो बेसबब उदास है जी
इश्क़ होता तो कोई बात भी थी

जलता फिरता हूँ क्यूँ दो-पहरों में
जाने क्या चीज़ खो गई मेरी

वहीं फिरता हूँ मैं भी ख़ाक बसर
इस भरे शहर में है एक गली

छुपता फिरता है इश्क़ दुनिया से
फैलती जा रही है रुसवाई

हमनशीं क्या कहूँ कि वो क्या है
छोड़ ये बात नींद उड़ने लगी

आज तो वो भी कुछ ख़ामोश सा था
मैं ने भी उस से कोई बात न की

एक दम उस के हाथ चूम लिये
ये मुझे बैठे-बैठे क्या सूझी

तू जो इतना उदास है “नासिर”
तुझे क्या हो गया बता तो सही


३१.
अपनी धुन में रहता हूँ, मैं भी तेरे जैसा हूँ
ओ पिछली रुत के साथी, अब के बरस मैं तन्हा हूँ

तेरी गली में सारा दिन, दुख के कंकर चुनता हूँ
मुझ से आँख मिलाये कौन, मैं तेरा आईना हूँ

मेरा दिया जलाये कौन, मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ
तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ

अपनी लहर है अपना रोग, दरिया हूँ और प्यासा हूँ
आती रुत मुझे रोयेगी, जाती रुत का झोंका हूँ