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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

बहादुरशाह ज़फ़र


१.

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्मे-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

उनकी आंखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
कि तबीअत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
खू तेरी हूरे-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

२.

न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका, मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ, न तो मैं किसी का रकीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ

पए-फातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढाये क्यों
कोई आके शम'अ जलाए क्यों, मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन खिजां में उजड़ गया, मैं उसी की फस्ले-बहार हूँ

३.

लगता नहीं है जी मेरा उजडे दयार में
किसकी बनी है आलमे-नापाएदार में

बुलबुल को बागबाँ से न सैयाद से गिला
क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिले-दागदार में

इक शाखे-गुल पे बैठके बुलबुल है शादमाँ
कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालाज़ार में

उम्र-दराज़ मांग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इन्तेज़ार में

दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोएंगे कुंजे-मज़ार में

कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूए-यार में.

४.

खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बगैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बगैर

क्योंकर कहूँ तुम आओ, कि दिल की कशिश से वो
आयेंगे दौडे आप मेरे घर कहे बगैर

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बगैर

बेदर्द तू सुने-न-सुने लेक दर्दे-दिल
रहता नहीं है आशिके-मुज़्तर कहे बगैर

तक़दीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ 'ज़फ़र' है मुक़द्दर कहे बगैर

५.

दिल की मेरे बेक़रारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शब् की मेरी आहो-ज़ारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

बारे-गम से मुझपे रोज़े-हिज्र में इक-इक घड़ी
क्या कहूँ है कैसी भारी मुझसे कुछ पूछो नहीं

मेरी सूरत ही से सब मालूम कर लो हम्दमो
तुम हकीकत मेरी सारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं

शाम से ता-सुब्ह जो बिस्तर पे तुम बिन रात को
मैंने की अख्तर-शुमारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं

ऐ 'ज़फ़र' जो हाल है मेरा करूँगा गर बयाँ
होगो उनकी शर्मसारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं

६.

कीजे न दस में बैठ कर आपस की बातचीत
पहुँचेगी दस हज़ार जगह दस की बातचीत
कब तक रहें ख़मोश के ज़ाहिर से आप की
हम ने बहुत सुनी कस-ओ-नाकस की बातचीत
मुद्दत के बाद हज़रत-ए-नासेह करम किया
फ़र्माइये मिज़ाज-ए-मुक़द्दस की बातचीत
पर तर्क-ए-इश्क़ के लिये इज़हार कुछ न हो
मैं क्या करूँ नहीं ये मेरे बस की बातचीत
क्या याद आ गया है ज़फ़र पंजा-ए-निगार
कुछ हो रही है बन्द-ओ-मुख़म्मस की बातचीत
७.
तुम न आये एक दिन का वादा कर दो दिन तलक
हम पड़े तड़पा किये दो-दो पहर दो दिन तलक
दर्द-ए-दिल अपना सुनाता हूँ कभी जो एक दिन
रहता है उस नाज़नीं को दर्द-ए-सर दो दिन तलक
देखते हैं ख़्वाब में जिस दिन किसू की चश्म-ए-मस्त
रहते हैं हम दो जहाँ से बेख़बर दो दिन तलक
गर यक़ीं हो ये हमें आयेगा तू दो दिन के बाद
तो जियें हम और इस उम्मीद पर दो दिन तलक
क्या सबब क्या वास्ता क्या काम था बतलाइये
घर से जो निकले न अपने तुम "ज़फ़र" दो दिन तलक
८.
रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया
सुबह को खौफे शबे तार न सोने न दिया
शम्अ की तरह मुझे रात कटी सूली पर
चैन से यादे कदे यार ने सोने न दिया
यह कराहा दर्द के साथ तेरा बीमार-ए-अलम
किसी हमसायें को बीमार ने सोने न दिया
ए दिल-ए-जार तु सोया किया आराम से रात
मुझे पल भर भी दिल-ए-जार सोने न दिया
सोऊं मैं क्या कि मेरे पांव को भी जिन्दां में
आरजू-ए-खलिश-ए-यार ने सोने न दिया
यासो-गम रंजो-ताअब मेरे हुए दुश्मने-जां
ज़फ़र’, शब इन्हीं दो-चार ने सोने ना दिया
९.
रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले
हमको शबनम की तरह सब है रूलाने वाले
सोजिशे-दिल का नहीं अश्क बुझाने वाले
बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले
मुंह पे सब जर्दी-ए-रूख़सार कहे देती है
क्या करें राज मुहब्बत के छिपाने वाले
देखिए दाग़ जिगर पर हों हमारे कितने
वह तो इक गुल हैं नया रोज खिलाने वाले
दिल को करते है बुतां,थोड़े से मतलब पे खराब
ईंट के वास्ते
, मस्जिद हैं ये ढाने वाले
नाले हर शब को जगाते हैं ये हमसायों को
बख्त-ख्वाबीदा को हों काश
, जगाने वाले
खत मेरा पढ़ के जो करता है वो पुर्जे-पुर्जे
ज़फ़र’, कुछ तो पढ़ाते हैं पढ़ाने वाले
१०.
ऐश से गुजरी कि गम के साथ,अच्छी निभ गई
निभ गई जो उस सनम के साथ
, अच्छी निभ गई
दोस्ती उस दुश्मने-जां ने निबाही तो सही
जो निभी जुल्मो-सितम के साथ
, अच्छी निभ गई
खूब गुजरी गरचे औरों की निशातो-ऐश में
अपनी भी रंजो-अलम के साथ
, अच्छी निभ गई
हमको था मंजूर अपनी खाकसारी का निबाह
बारे उस खाके-कदम के साथ
, अच्छी निभ गई
जो जुबां पर उसकी आया,लब पे नक्श उसने किया
लोह की सोहबत कलम के साथ अच्छी निभ गई
बू-ए-गूल क्या रह के करती,गुल ने रहकर क्या किया
वह नसीमे-सुबह-दम के साथ
, अच्छी निभ गई
शुक्र-सद-शुक्र अपने मुंह से जो निकाली मैंने बात
ज़फ़र’, उसके करम के साथ,अच्छी निभ गई