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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 26 मई 2013

बैरीसाल के दोहे

जन्म: 1719,रीति काल के कवि बैरीसाल असनी, फ़तेहपुर ज़िले के रहने वाले ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुए थे।
इन्होंने 'भाषा भरण' नामक एक अच्छा अलंकार ग्रंथ संवत 1825 में रचा, जिसमें प्राय: दोहे ही हैं।

ऐसे ही इन कमल कुल जीत लियो निज रंग।
कहा करन चाहत चरन लहि अब जावक संग॥

लसत लाल डोरेऽरु सित चखन पूतरी स्याम।
प्यारी तेरे दृगन मैं कियो तिं गुन धाम॥

कर छुटाइ भजि दुरि गई कनक पूतरिन माहिं।
खरे लाल बिलपत खरे नेक पिछानत नाहिं॥

निज प्रतिबिंबन में दुरी मुकुीर धाम सुखदानि।
लई तुरत ही भावते तन सुवास पहिचान॥

बिरह तई लखि नरदई मारत नहीं सकात।
मार नाम बिधि ने कियो यहै जानि जिय बात॥

तोष लहत नहिं एक सों जात और के धाम।
कियो बिधातै रावरे यातैं नायक नाम॥

अलि ये उडगन अगिनि कन अंक धूम अवधारि।
मानहु आवत दहन ससि लै निज संग दवारि॥

करत नेह हरि सों भटू क्यों नहिं कियो बिचार।
चहत बचायो बसन अब बौरी बांधि अंगार।

सेत कमल कर लेत ही अरुन कमल छबि देत।
नील कमल निरखत भयो हंसत सेत को सेत॥