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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 25 मई 2013

अशोक मिज़ाज 'बद्र'


१.

बहुत से मोड़ हों जिसमें कहानी अच्छी लगती है,
निशानी छोड़ जाए वो जवानी अच्छी लगती है।

सुनाऊं कौन से किरदार बच्चों को कि अब उनको,
न राजा अच्छा लगता है न रानी अच्छी लगती है।

खुदा से या सनम से या किसी पत्थर की मूरत से,
मुहब्बत हो अगर तो ज़िंदगानी अच्छी लगती है।

पुरानी ये कहावत है सुनो सब की करो मन की,
खुद अपने दिल पे खुद की हुक्मरानी अच्छी लगती है।

ग़ज़ल जैसी तेरी सूरत ग़ज़ल जैसी तेरी सीरत,
ग़ज़ल जैसी तेरी सादा बयानी अच्छी लगती है।

गुज़ारो साठ सत्तर साल मैदाने अदब में फिर,
क़लम के ज़ोर से निकली कहानी अच्छी लगती है।

मैं शायर हूँ ग़ज़ल कहने का मुझको शौक़ है लेकिन,
ग़ज़ल मेरी मुझे तेरी ज़ुबानी अच्छी लगती है।

२.

ज़रा सा नाम पा जाएँ उसे, मंज़िल समझते हैं
बड़े नादान हैं मझधार को साहिल समझते हैं।

अगर वो होश में रहते तो दरिया पार कर लेते,
ज़रा सी बात है लकिन कहाँ गाफिल समझते हैं।

अकेलापन कभी हमको अकेला कर नहीं सकता,
अकेलेपन को हम महबूब की महफ़िल समझते हैं।

बड़े लोगों के चहरों पर शिकन भी आ नहीँ सकती,
कोई कालिख भी मल दे तो उसे वो तिल समझते हैं।

अजब बस्ती है इस बस्ती में सब रंगदार हैं शायद,
शरीफों को तो वो पैदाइशी बुझदिल समझते हैं।

मिज़ाज, अपना फ़क़ीराना है फिर भी शुक्र है यारो.
हमें भी लोग अपनी भीड़ में शामिल समझते हैं।
३.

कभी खुद अपने हाथो से प्याले टूट जाते है
कभी पीने पिलाने मे ये शीशे टूट जाते है

हम इस धरती के वासी है अगर टूटे तो क्या ग़म है
फलक पर हमने देखा है सितारे टूट जाते है

बहुत कम लोग ऐसे है, जिन्हें रहजन मिले होंगे
ज्यादातर मुसाफ़िर को मुसाफ़िर लुट जाते है

वो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो गया जो हमसे कहता था
जो शीशे जैसे होते है वो एक दिन टूट जाते है

कदम रुकने नहीं देना, सफ़र में ऐसा होता है
नए छले उभरते है पुराने फूट जाते है