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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

डॉ सुधेश जी के दोहे

परिचय: हिन्दी के कवि ,आलोचक ,संस्मरण एवं यात्रावृत्तान्त लेखक ,दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प़ोफेसर (सेवा निवृत्त ) 
प्रकाशन: दस काव्य संग़ह ,दस आलोचनात्मक पुस्तकें तीन यात्रा वृत्तान्त,,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास ,एक आत्म कथा (प्रथम खण्ड ) अंग़ेज़ी में लिखित निबन्ध संग़ह Reflections on Hindi literature (प़काश्य ) उर्दू ,अंग़ेज़ी की चयनित कविताएँ ,निबन्ध हिन्दी में अनूदित , पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
सम्पर्क सूत्र३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैक्टर १०, दिल्ली ११००७५ फ़ोन ०९३५०९७४१२० ईमेल drsudhesh@gmail.com
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१. 
हिन्दी सेवा हो रही अंग्रेज़ी में बोल
भूले निज इतिहास पर याद रहा भूगोल ।

जिस को देखो दौड़ता अमरीका की ओर 
, हिन्दी भी अब खींचती उन्हें देश की ओर ।
२. 
अपनी छोटी बात भी लाख टके की बात
दूजा सच्ची बात कह खाये शठ की लात ।

कीकर काँटा जल उठा जब देखा जलजात
खिला पात जो पास में करे घात पर घात ।

मति नीची करनी अधम ओछी उस की बात
ऊँची डाली का सुमन करे गगन से बात ।

कितने पानी में खड़ा मानव या जलजात
उस पल हो जाता प़कट चलती है जब बात ।

कभी बड़ा मालिक रहा सब थे तेरे दास
बहुत मलाई खा चुका अब तो रख उपवास ।

यह बौना गोरखपुरी वह बलिया का जाट
सब हिन्दी को चर रहे क्या बांभन क्या जाट ।

यह चाचा गोरखपुरी वह बनारसी बाप
संसद में इंग्लिश बकैै बाहर हिन्दी जाप । । 

दिल्ली या परदेश में हिन्दी की जय बोल
गंगाजल में पर कभी लेना व्हिस्की घोल ।

दुर्घटना को देख कर सभ्य नागरिक मौन 
पड़े पुलिस के फेर में वक़्त गँवाए कौन ।

अपने अपने लाभ में सब इतने तल्लीन 
ज्यों पोखर में मेंढकी ज्यों नदिया में मीन ।

लिख लिख काग़ज़ रख दिये पढ़ने वाला कौन 
जो पढ़ते सब बुद्धि जन सब ने रक्खा मौन ।

लिख लिंख काग़ज़ धर गए कवि पुंंगव उर चीर 
चिता राख बन उड़ेंगे यमुना गंगा तीर ।

धन बल पशुबल से यहाँ लो सारा जग जीत
सब कुछ मिल जाए मगर मिले न मन का मीत ।

सभी दौड़ते दौड़ में सब कुछ पीछे छोड़ 
निकलेंगे पर अन्त में सब के सब रणछोड़ ।
३. 
काम धाम औ दाम संग खूब कमाया नाम 
पर इतिहासों में नहीं मिला तुम्हारा नाम ।

नाच कूद कर हर जगह खूब कमाया नाम 
बहते पानी पर लिखा मिला तुम्हारा नाम ।

झूठमूठ कोई कहें आप बनें अध्यक्ष 
क़ब्र तोड़ कर प्रकटते महा महिम प्रत्यक्ष । 

काम काम कहते रहे कभी न आए काम
जाप किया निष्काम का निकले रति के काम ।

जन्म मरण हैं दु:ख से तब देनों हैं दु:ख 
विरलों ने मन जीत कर उन्हें बनाया सुक्ख ।

भोगों में ही लीन जो करें त्याग की बात 
सुन सुन कर आवै हँसी यह अनहोनी बात ।

छीना झपटी लूटना है डाकू की रीति 
मिल बाँटें मिल खांय तो यह सज्जन की नीति । 

तन रोगों की खान है मन भावों की खान 
एक थके दूजा उड़ै नापै गगन वितान । 

अब इतनी मारक हुई निजप्रचार की भूख 
कथाकार दुबले हुए गए महाकवि सूख ।

नाम छपे परिचय छपे या पुस्तक छप जाय 
अहोभाग्य जो साथ में फ़ोटो ही छप जाय ।
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