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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

मुनव्वर राणा


१.
कम से कम बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसे मिट्‍टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ

जो भी दौलत थी वह बच्चों के हवाले कर दी
जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं

जिस्म पर मेरे बहुत शफ्फाफ़ कपड़े थे मगर
धूल मिट्‍टी में अटा बेटा बहुत अच्छा लगा

भीख से तो भूख अच्छी गाँव को वापस चलो
शहर में रहने से ये बच्चा बुरा हो जाएगा

अगर स्कूल में बच्चे हों घर अच्छा नहीं लगता
परिंदों के न होने से शजर अच्‍छा नहीं लगता

धुआँ बादल नहीं होता कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है


२.
कई घरों को निगलने के बाद आती है
मदद भी शहर के जलने के बाद आती है

न जाने कैसी महक आ रही है बस्ती में
वही जो दूध उबलने के बाद आती है

नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है

ये झुग्गियाँ तो ग़रीबों की ख़ानक़ाहें* हैं-------- आश्रम
क़लन्दरी* यहाँ पलने के बाद आती है-------फक्कड़पन

गुलाब ऎसे ही थोड़े गुलाब होता है
ये बात काँटों पे चलने के बाद आती है
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है
खिज़ाँ तो फूलने-फलने के बाद आती है

३.

मिट्टी में मिला दे के जुदा हो नहीं सकता
अब इससे ज़्यादा मैं तेरा हो नहीं सकता

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँख़ें
रोशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता

बस तू मेरी आवाज़ से आवाज़ मिलादे
फिर देख के इस शहर में क्या हो नहीं सकता

ऎ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला
सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता

इस ख़ाक बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी
क्या इतना करम बादे सबा हो नहीं सकता

पेशानी को सजदे भी अता कर मेरे मौला
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता

दरबार में जाना मरा दुश्वार बहुत है
जो शख़्स क़लन्दर हो गदा हो नहीं सकता

दहलीज़-----चौखट, सय्याद-----शिकारी
बादेसबा----सुबह की पूर्वा हवा,
सजदा---- सिर झुका कर माथा टिकाना
क़लन्दर ------मस्तमौला, अपनी मरज़ी का मालिक
गदा-------भिकारी--- दर-दर माँगने वाला

४.

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है

मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है

उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी
तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है

तभी जा कर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है
कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है
कली जब सो के उठती है तो तितली मुस्कुराती है

हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ पर हमेशा रश्क आता है
मसायल से घिरी रहती है फिर भी मुस्कुराती है

बड़ा गहरा तअल्लुक़ है सियासत से तबाही का
कोई भी शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कुराती है.

५.

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर
हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है

भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

हसद की आग में जलती है सारी रात वह औरत
मगर सौतन के आगे अपना जूठा डाल देती है 

६.
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ
रोज़ उँगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है

दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं
सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है

रात भर जागते रहने का सिला है शायद
तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है

एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा
सारी दुनिया दिल-ए-बेताब में आ जाती है

ज़िन्दगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए
कूचा-ए-रेशम-ओ-कमख़्वाब में आ जाती है

दुख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें
सारी मिट्टी मेरे तालाब में आ जाती है.

७.

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ

मेरी ख़्वाहिश कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

कम-से-बच्चों के होंठों की हँसी की ख़ातिर
ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊँ

सोचता हूँ तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सोचूँ तो अकेला हो जाऊँ

चारागर तेरी महारत पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊँ

बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शम्अ तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊँ

शायरी कुछ भी हो रुस्वा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊँ तो नंगा हो जाऊँ.

८.

 

  1. न मैं कंघी बनाता हूँ न मैं चोटी बनाता हूँ
    ग़ज़ल में आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ

    ग़ज़ल वह सिन्फ़-ए-नाज़ुक़ है जिसे अपनी रफ़ाक़त से
    वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ

    हुकूमत का हर एक इनआम है बंदूकसाज़ी पर
    मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूँ

    मेरे आँगन की कलियों को तमन्ना शाहज़ादों की
    मगर मेरी मुसीबत है कि मैं बीड़ी बनाता हूँ

    सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की
    मैं मिट्टी गूँधता था अब डबल रोटी बनाता हूँ

    वज़ारत चंद घंटों की महल मीनार से ऊँचा
    मैं औरंगज़ेब हूँ अपने लिए खिचड़ी बनाता हूँ

    बस इतनी इल्तिजा है तुम इसे गुजरात मत करना
    तुम्हें इस मुल्क का मालिक मैं जीते-जी बनाता हूँ

    मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
    मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ

    तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने से गुज़रना है
    तुझे मैँ इस लिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ

    मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी
    जलाकर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ

    ९.
    सिरफिरे लोग हमें दुश्मने जाँ कहते हैं
    हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

    मुझे बस इसलिए अच्छी बहार लगती है
    कि ये भी माँ की तरह खुशग्वार लगती है

    मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
    मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

    लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
    बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

    किसी को घर मिला हिस्से में या दुकाँ आई
    मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

    इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
    माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती

    ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
    मैं जब तक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

    खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी थीं गाँव से
    बासी भी हो गई हैं तो लज्जत वही रही

    बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
    माँ सबसे कह रही है बेटा मज़े में है

    लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
    मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है।

    १०.
    इसी गली में वो भूखा किसान रहता है!
    ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है!!

    मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े!
    कि इस पे चिडियों का इक ख़ानदान रहता है!!

    सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा!
    हमेशा चोट का ताज़ा निशान रहता है !!

    तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं!
    तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !!

    हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो!
    हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है!!

    सजाये जाते हैं मक़तल मेरे लिये ‘राना’!
    वतन में रोज़ मेरा इम्तहान रहता है!!

    ११.

    हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता!
    ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!!

    मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन!
    मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!!

    वो मुझसे बिछड़ते हुए रोया नहीं वरना!
    दो चार बरस और मैं शादी नहीं करता!!

    वो मुझसे बिछड़ने को भी तैयार नहीं है!
    लेकिन वो बुज़ुर्गों को ख़फ़ा भी नहीं करता!!

    ख़ुश रहता है वो अपनी ग़रीबी में हमेशा!
    ‘राना’ कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता!! 

    १२.
    उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं!
    क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं!!

    जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी!
    जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं !!

    मैंने फल देख के इन्सानों को पहचाना है!
    जो बहुत मीठे हों अंदर से सड़े रहते हैं!!

    १३.
    मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं !
    तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !!

    कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है !
    कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!!

    नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में !
    पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !!

    अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी !
    वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !!

    किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी !
    किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!!

    पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से!
    निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!!

    जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है!
    वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!!

    यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद!
    हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!!

    हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है !
    हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!!

    हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है!
    अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!!

    सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे!
    दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!!

    हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं!
    अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!!

    गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब!
    इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!!

    हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की !
    किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! 

    १३.
    बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है,
    न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाता है,

    यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे,
    यही मौसम है अब सीने में सरदी बैठ जाता है,

    चलो माना कि शहनाई मर्सरत की निशानी है,
    मगर वह शख्*स जिसकी आ के बेटी बैठ जाता है,

    बड़े बूढे कुऐं में नेकियां क्*यों फेंक आते हैं,
    कुएं में छिप के आखि़र क्*यों ये नेकी बैठ जाता है,

    नक़ाब उलटे हुये जब भी चमन से वह गुजरता है,
    समझ् कर फूल उसके लब पर तितली बैठ जाती है,

    सियासत नफ़रतों का ज़ख्*म भरने नहीं देती,
    जहां भरने पे आता है तो मक्*खी बैठ जाती है,

    वह दुशमन ही सही, आवाज दे उसको मुहब्*बत से,
    सलीके से बिठा कर देख हड्डी बैठ जाती है..... 


    १४.

    ऐ अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
    माँ ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया .

    मैं ने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
    मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना .

    किसी के हिस्से में घर आया, किसी के हिस्से दुकान आई
    मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई .

    लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती
    बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती .

    इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
    माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है .

    अभी जिंदा है मेरी माँ मुझे कुछ भी नहीं होगा
    मैं जब घर से निकलता हूँ , दुआ भी साथ चलती है .

    जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
    माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है .

    मेरी ख्वाहिश है मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं
    माँ से इस तरह से लिपटूं कि बच्चा हो जाऊं .

    मुनव्वर माँ के आगे यों कभी खुल कर नहीं रोना
    जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती