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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 19 मई 2013

बुनियाद हुसैन ज़हीन

मुहल्लाह- भिष्तियान, मुषायरा चैक, मदीना मस्जिद के पीछे, बीकानेर, राजस्थान-
0941 426 5391
१.

हैं भरम दिल का मोतबर रिश्ते
आज़माओ तो मुख्तसर रिश्ते

हो गए कितने दर - ब- दर रिश्ते
अपने ही खून में हैं तर रिश्ते

कल महकते थे घर के घर; लेकिन
बन गए आज दर्दे - सर रिश्ते

उनसे उम्मीद ही नहीं रक्खी
वरना रह जाते टूट कर रिश्ते

कम ही मिलते हैं इस ज़माने में
दर्द के; गम के; हमसफ़र रिश्ते

मैं इन्हें मरहमी समझता था
हैं नमक जैसे ज़ख्म पर रिश्ते

हैं ये तस्बीह के से दाने ''ज़हीन''
बिखरे - बिखरे से हैं मगर रिश्ते

२.

इस एक ज़ौम में जलते हैं ताबदार चराग़
हवा के होश उडायेंगे बार - बार चराग़

जो तेरी याद में मैंने जला के रक्खे हैं
तमाम रात करे हैं वो बेक़रार चराग़

ख़मोश रह के सिखाते हैं वो हमें जीना
जो जल के रोशनी देते हैं बेशुमार चराग़

हर एक दौरे-सितम के हैं चश्मदीद गवाह
इसी लिए तो हैं दुनिया से शर्मसार चराग़

ज़माने भर में हमीं से है रोशनी का वजूद
उठा के सर ये कहेंगे हज़ार बार चराग़

तुम्हारे चेहरे कि ताबिंदगी के बाइस ही
मेरी निगाह में रोशन हैं बेशुमार चराग़

इन्हें हक़ीर समझने कि भूल मत करना
हवा के दोश पे हो जाते हैं सवार चराग़

बुझा सके न जिन्हें तेज़ आंधियां भी ''ज़हीन''
वही तो होते हैं दरअस्ल जानदार चराग़

३.

कितने मासूम परिंदों का ठिकाना होगा
क्या शजर काटने वालों ने ये सोचा होगा

आलमे - यास में जब याद वो आया होगा
अश्क बन - बन के लहू आँख से टपका होगा

ज़िन्दगी तुझसे डरा है न डरेगा वो कभी
मौत की गोद में दिन - रात जो खेला होगा

उसने अश्कों के दिए कैसे जला रक्खे हैं
रात के घोर अँधेरे में वो तनहा होगा

किस क़दर डरता है मज़लूम की आँहों से फलक
ज़िन्दगी तूने तो हर दौर में देखा होगा

याद आएगा तुम्हें गाँव के पेड़ों का हुजूम
जिस्म जब शहर की गर्मी से झुलसता होगा

शायद अंगड़ाई मेरी याद ने ली होगी ''ज़हीन''
उसने आईना तभी गौर से देखा होगा

४.

सर ख़ुशी की ज़ीस्त में सौगात लेकर आएगा
जब कोई बच्चा नए जज़्बात लेकर आएगा

वक़्त जब मजबूरिये - हालात लेकर आएगा
खून में डूबे हुए दिन - रात लेकर आएगा

गम तेरी बर्बादियों का देख लेना एक दिन
जान पर मेरी कई सदमात लेकर आएगा

अब वो मेरे सहने - दिल में जब भी रक्खेगा क़दम
मेरे हिस्से की ख़ुशी भी साथ लेकर आएगा

मेरे ज़ख्मों को वो फिर से ताज़ा करने के लिए
बातों - बातों में पुरानी बात लेकर आएगा

हम ग़रीबों की दुआओं का नया बादल ''ज़हीन''
रहमतों की इक नयी बरसात लेकर आएगा

५.

आदमी कब किसी से डरता है
ये तो बस जिन्‍दगी से डरता है


क़हर ढाएगी जाने क्‍या मुझ पर
दिल तेरी खामुशी से डरता है

मुर्दादिल को ये कोन समझाए
ज़ुल्‍म, ज़िन्‍दादिली से डरता है

डर ख़ुदा का न हो अगर दिल में
आदमी आदमी से डरता है

ज़ख्‍म जिसने कभी दिये थे ‘ज़हीन’
आज तक दिल उसी से डरता है।

६.

ये ज़िंदगी का मुकद्दर है क्या किया जाए
क़जा का वक्त मुक़र्रर है क्या किया जाए.

हर इक निगाह के अन्दर है क्या किया जाए
बहुत डरावना मंज़र है क्या किया जाए.

हसीन से भी हंसीतर हैं क्या किया जाए
तेरे ख़याल का पैकर है क्या किया जाए.

हर एक शख्स के दिल में है ख्वाहिशों का हुजूम
तलब सभी की बराबर है क्या किया जाए.

ये जान जिस्म से हो सकती है जुदा लेकिन
ये मेरी रूह के अन्दर है क्या किया जाए.

जो गीत दारो-रसन का न गा सका कोई
वो सिर्फ़ मेरी जुबां पर है क्या किया जाए.

वो जिसके नाम से मैं बदनाम हुआ था कभी
फिर उसका नाम ज़बां पर है क्या किया जाए.

वो जीस्त मैं जिसे सहरा समझ रहा था ‘ज़हीन’
मुसीबतों का समन्दर है क्या किया जाए.
७.
उम्मीद मन्ज़िले -मक़सूद की बहुत कम है,
तेरे मिज़ाज में आवारगी बहुत कम है।

नये ज़माने के इन्सान क्या हुआ तुझको,
तेरे सुलूक में क्यूं सादगी बहुत कम है।

वो जिनसे ज़ीस्त की हर एक राह रोशन थी
उन्हीं चराग़ों में अब रोशनी बहुत कम है।

मैं अपनी उम्र की तुझको दुआएं दूं कैसे,
मुझे ख़बर है मेरी ज़िन्दगी बहुत कम है।

जो सायादार कभी मौसमे-बहार में था,
उसी दरख़्त का साया अभी बहुत कम है।

तमाम रिश्तों की बुनियाद है फक़त एहसास,
मगर दिलों में तो एहसास ही बहुत कम है।

बदलते दौर की ज़द में है गुलसितां का निज़ाम,
‘ज़हीन’ फूलों में अब ताज़गी बहुत कम है।

८.

फूल खिलने की मौसम ख़बर दे गया,
रुह को ताज़गी का सफर दे गया।

डर गया है वो क्या मेरी परवाज़ से ,
हौसले छीन कर बाल-ओ-पर दे गया।

मुश्किलें ज़िन्दगानी की आसां हुई,
वक़्त जीने का ऐसा हुनर दे गया।

बारिशें रहमतों की बरसने को है,
उड़ता बादल हमें ये ख़बर दे गया।

जब दिखाए उसे उसके चेहरे के दाग़,
आईना वो मुझे तोड़ कर दे गया।

किसने बख्शी है फूलों को खुश्बू ‘ज़हीन’
कौन है जो शजर को समर दे गया।

९.

कभी दर्द-ए-दिल की दवा चाहता हूँ
कभी रोग इससे सिवा चाहता हूँ

अरे बेवफा सुन मैं क्या चाहता हूँ
खता मैंने की है सजा चाहता हूँ

मयस्सर न आई थी ताबीर जिसकी
वही खवाब फिर देखना चाहता हूँ

ज़माने के जुल्मो -सितम सह गया मैं
तेरे ज़ुल्म की इन्तहा चाहता हूँ

जिसे देख कर ज़ख्म दिल के हरे हों
उसे इक नज़र देखना चाहता हूँ

"ज़हीन" आज फिर क्यूँ मैं उसकी कहानी
उसी की ज़बानी सुना चाहता हूँ

१०.

नस्ले-आदम में सादगी भर दे
अब तो इन्साँ में आजिज़ी भर दे

बिस्तरे-मर्ग पे जो लेटे हैं
उनकी साँसों में ज़िन्दगी भर दे

हम ग़रीबों के आशियानों में
मेरे मालिक तू रोशनी भर दे

भीगी-भीगी रहें मेरी पलकें
इनमें एहसास की नमी भर दे

फ़स्ले-गुल और मैं तही-दामन
मेरे दामन में भी ख़ुशी भर दे

अब तो सारा चमन शबाब पे है
पत्ते-पत्ते में सरख़ुशी भर दे

तेरे नग़मे हों क्यूँ उदास ज़हीन
इनकी रग-रग में शाइरी भर दे

११.

हैं भरम दिल का मोतबर रिश्ते
आज़माओ तो मुख्तसर रिश्ते

हो गए कितने दर-ब-दर रिश्ते
अपने ही खून में हैं तर रिश्ते

कल महकते थे घर के घर लेकिन
बन गए आज दर्दे -सर रिश्ते

उनसे उम्मीद ही नहीं रक्खी
वरना रह जाते टूट कर रिश्ते

कम ही मिलते हैं इस ज़माने में
दर्द के गम के हमसफ़र रिश्ते

मैं इन्हें मरहमी समझता था
हैं नमक जैसे ज़ख्म पर रिश्ते

हैं ये तस्बीह के से दाने "ज़हीन"
बिखरे-बिखरे से हैं मगर रिश्ते

१२.

कौन कहता है सिर्फ़ ध्यान में है
वो मेरे दिल में मेरी जान में है

जिसके पर नोच डाले थे तुम ने
वो परिंदा अभी उड़ान में है

कल कोई फ़ासला न था हम में
बेरूख़ी आज दरमियान में है

ज़िंदगी की तबाही का सामाँ
दौरे हाज़िर की हर दुकान में है

वो सुनेगा मेरी दुआओं को
इतनी तासीर तो ज़बान में है

है गवाहों पे फ़ैसले का मदार
झूठ ही झूठ बस बयान में है

कितने दुश्वार मरहले हैं ज़हीन
ज़िंदगी सख़्त इम्तिहान में है

१३.

गमों से प्यार न करता तो और क्या करता
ये दिल फ़िगार न करता तो और क्या करता

वो ज़ुल्म करता था मज़लूम पे तो मैं उस पर
पलट के वार न करता तो और क्या करता

वो अहद करके गया था कि लौट आऊंगा
मैं इन्तिज़ार न करता तो और क्या करता

था जिस फ़साने का हर लफ़्ज़ दास्ताने-अलम
वो अश्कबार न करता तो और क्या करता

समझ लिया मुझे मंसूर एक दुनिया ने
कुबूल दार न करता तो और क्या करता

जो ज़ख्म तूने दिए उनको गम के धागे में
पिरो के हार न करता तो और क्या करता

मेरे यकीं पे जो उतरा नहीं खरा तो उसे
मैं शर्मसार न करता तो और क्या करता

ज़हीन उसके सिवा कौन था मेरा हमदर्द
मैं उससे प्यार न करता तो और क्या करता