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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 21 मई 2013

आशुतोष द्विवेदी

जन्म: 02 जून 1982. जन्म स्थान, कानपुर, उत्तर प्रदेश,१९९४ से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक |ब्लॉग dwivediashutosh.blogspot.com


(१)
भाषा में जो भाव बँधे, उनको सारी दुनिया समझे |
अंतरतम कि मूक साधना कोई सरल हिया समझे |

रास रचाने रात गए किस पागलपन में पाँव बढे?
इसे न मैं भी जानूं, केवल मेरा सांवरिया समझे |

उसके ही स्वर जग जाएँ तो फिर घर-घर हो रामायण,
एक व्यक्ति ऐसा जो सारे जग को राम-सिया समझे |

अँधियारे का एक लक्ष्य, बस उजियारे को ग्रस लेना,
इसी चुनौती को नन्हा सा जलता हुआ दिया समझे |

जिस दिन यह मन दास हुआ, उस दिन सारा स्वामित्व मिला,
रहे भिखारी तब तक, जब तक अपने को मुखिया समझे |

कवि का चित्त कि जो भटकन में ही आश्रय को खोज रहा,
और किसे यह चाह कि वो चातक का पिया-पिया समझे |

जाती है वह अमियमयी जिस ओर स्वर्ग बन जाता है,
इस महिमा को ‘आशुतोष’ कि छोटी सी कुटिया समझे |

(२)

यहाँ खामोश नज़रों की गवाही कौन पढ़ता है ?
मेरी आँखों में तेरी बेगुनाही कौन पढ़ता है ?

नुमाइश में लगी चीज़ों को मैला कर रहे हैं सब,
लिखी तख्तों पे - "छूने की मनाही" कौन पढ़ता है ?

जहाँ दिन के उजालों का खुला व्यापार चलता हो,
वहाँ बेचैन रातों की सियाही कौन पढ़ता है ?

ये वो महफिल है, जिसमें शोर करने की रवायत है,
दबे लब पर हमारी वाह-वाही कौन पढ़ता है ?

वो बाहर देखते हैं, औ' हमें मुफलिस समझते हैं,
खुदी जज्बों पे - अपनी बादशाही कौन पढ़ता है ?

जो खुशकिस्मत हैं, बादल-बिजलियों पर शेर कहते हैं,
लुटे आँगन में मौसम की तबाही, कौन पढ़ता है ?

३.
वो यही सोच के बाज़ार में आई होगी |
आबरू बेंच के थोड़ी तो कमाई होगी |

उसने कपड़ों पे' बहुत खर्च किया होगा पर,
ऐसा फैशन है कि तन ढँक नहीं पायी होगी |

ये तो मालूम था सच को न सुना जायेगा,
पर ये अंदाज़ा नहीं था कि पिटाई होगी |

जैसे बन में रँगा सियार बना था राजा,
वैसे नेताओं ने सरकार बनाई होगी ?

कोई बड़ों से ये कह दे कि ज़रा कम बोलें,
इसी में देश के बच्चों की भलाई होगी |

खुशबुएँ ले के हवाएं उधर से आती हैं,
उस कली ने मेरी ग़ज़ल कोई गायी होगी |