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सन्देश

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और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 29 जून 2013

श्यामल सुमन के मुक्तक

नाम : श्यामल किशोर झा,लेखकीय नाम : श्यामल सुमन,जन्म तिथि : 10.01.1960 
जन्म स्थान : चैनपुर, जिला सहरसा, बिहार, भारत शिक्षा : एम० ए० - अर्थशास्त्र,तकनीकी 
                           शिक्षा:विद्युत अभियंत्रण में डिप्लोमा,गीत ग़ज़ल संकलन "रेत में जगती नदी","संवेदना के स्वर"-कला मंदिर प्रकाशन में प्रकाशनार्थ,ब्लोग्स -http://www.manoramsuman.blogspot.com-http://meraayeena.blogspot.com/http://
                                        




सोने की आरजू में सोना चला गया

जीवन को समझने की, सारी हैं कोशिशें
जितना भी कर सका हूँ, प्यारी हैं कोशिशें
जीने के सिलसिले में उठते हैं नित सवाल
निकलेगा हल, सुमन की जारी हैं कोशिशें

अपने ही घर में देखो, मेहमान कौन है
अपनी ही बुराई से, अनजान कौन है
नजरें जिधर भी जातीं बस आदमी दिखे
खोजो सुमन कि भीड़ में, इन्सान कौन है

जो चौक में बैठा था, कोना चला गया
जादू के साथ साथ में, टोना चला गया
पाने के लिए खोने की, रीति है सुमन
सोने की आरजू में सोना चला गया

रिश्तों में जो थे अपने, वो दूर हो गए
कहते हैं कि हालात से मजबूर हो गए
चेहरे की देख रौनक, ऐसा लगा सुमन
मजबूर ये नहीं हैं, मगरूर हो गए

कहते सभी को मिलता, जितना नसीब है
जिसको भी पूछो कहता, वह तो गरीब है
मेहनत का फल ही मिलता, बातें नसीब की
उलझी सुमन की दुनिया, बिल्कुल अजीब है


मौत के बाद है असल जीवन

मेरे घर में मेरा पसीना है
लगे हर ईंट में नगीना है
भले पानी टपक रहा छत से 
जिन्दगी लड़के सुमन जीना है

मौत से प्यार करना सीख सुमन
और जीवन से लड़ना सीख सुमन
मौत के बाद है असल जीवन
होश में जी के मरना सीख सुमन

कौन किसका रखे खयाल यहाँ
जिसको पूछो वही बेहाल यहाँ
फिर भी कैसे सुमन सामाजिक है
नहीं उठता कभी सवाल यहाँ

भला अपनों पे क्युँ बहम करना
नहीं दूजे पे तुम सितम करना
कोई गिरता है तो सम्भाल सुमन
पर गुजारिश है ना रहम करना


यही विश्वास बाकी है

किसी का ख्वाब मत तोड़ो, मेरी इतनी गुजारिश है
दिलों को दिल से जोड़ें हम, यही दिल की सिफारिश है
जहाँ पे ख्वाब टूटेंगे, क़यामत भी वहीं लाजिम
इधर दिल सूख जाते हैं, उधर नैनों से बारिश है

हकीकत से कोई उलझा, कोई उलझा बहाने में
बहुत कम जूझते सच से, लगे हैं आजमाने में
कहीं पर गाँव बिखरे हैं, कहीं परिवार टूटा है
दिलों को जोड़ने वाले, नहीं मिलते जमाने में

निराशा ही मिली अबतक, मगर कुछ आस बाकी है
जमीनें छिन रहीं हैं पर, अभी आकाश बाकी है
भले हँसकर या रो कर अब, हमे तो जागना होगा
उठेंगे हाथ मिलकर के, यही विश्वास बाकी है

पलट कर देख लें खुद को, नहीं फुरसत अभी मिलती
मुहब्बत बाँटने पर क्यों, यहाँ नफरत अभी मिलती
मसीहा ने ही मिलकर के, यहाँ विश्वास तोड़ा है
सुमन हों एक उपवन के, वही फितरत अभी मिलती


सुमन अंत में सो जाए

कैसा उनका प्यार देख ले
आँगन में दीवार देख ले
दे बेहतर तकरीर प्यार पर
घर में फिर तकरार देख ले

दीप जलाते आँगन में
मगर अंधेरा है मन में
समाधान हरदम बातों से
व्यर्थ पड़े क्यूँ अनबन में

अब के बच्चे आगे हैं
रीति-रिवाज से भागे हैं
संस्कार ही मानवता के
प्राण-सूत्र के धागे हैं

सुन्दर मन काया सुन्दर
ये दुनिया, माया सुन्दर
सभी मसीहा खोज रहे हैं
बस उनकी छाया सुन्दर

मन बच्चों सा हो जाए
सभी बुराई खो जाए
गुजरे जीवन इस प्रवाह में
सुमन अंत में सो


अश्क बनकर वही बरसता है

नहीं जज्बात दिल में कम होंगे
तेरे पीछे मेरे कदम होंगे
तुम सलामत रहो कयामत तक
ये है मुमकिन कि नहीं हम होंगे

प्यार जिसको भी किया छूट गया
बन के अपना ही कोई लूट गया
दिलों को जोड़ने की कोशिश में
दिल भी शीशे की तरह टूट गया

यार मिलने को जब तरसता है
बन के बादल तभी गरजता है
फिर भी चाहत अगर न हो पूरी
अश्क बनकर वही बरसता है

इश्क पे लोग का कहर देखा
और मुस्कान में जहर देखा
प्यार की शाम जहाँ पर होती
वहीँ से प्यार का सहर देखा


भले दिल हो मेरा विशाल नहीं
तेरे अल्फाज से मलाल नहीं
चाहे दुनिया यकीं करे न करे
इश्क करता सुमन सवाल नहीं



अकेलापन मेरी किस्मत

हमेशा भीड़ में फिर भी अकेलापन मेरी किस्मत
क्यूँ अपनों से,खुदा से भी, मिली कोई नहीं रहमत
जहाँ रिश्ते नहीं अक्सर वहीं पर प्रेम मिलता है
मगर रिश्ते जहाँ होते क्यूँ मिलती है वहीं नफरत

थपेड़ों को समझता हूँ हिलोरें भी समझता हूँ
हृदय की वेदना के संग हमेशा तुम पे मरता हूँ
सुमन तकदीर ऐसी क्यों कि पानी है मगर प्यासा
मगर है आस इक हरदम न जाने क्यों तरसता हूँ

इशारों को नहीं समझे उसे नादान मत कहना
मगर है प्यार हर दिल में कभी अनजान मत कहना
कोई मजबूरी ऐसी जो समझकर भी नहीं समझे
नहीं हो इश्क जिस दिल में उसे इन्सान मत कहना

हुई है देर कुछ ज्यादा सुमन तुमको समझने में
हृदय का द्वंद है कारण समय बीता उलझने में
मगर परवाह किसको है फुहारें प्रेम की सुरभित
मिलेंगे नैन चारों जब नहीं देरी बरसने में


क्या बात है

अपनों के आस पास है तो क्या बात है
यदि कोई उनमे खास है तो क्या बात है
मजबूरियों से जिन्दगी का वास्ता बहुत,
यूँ दिल में गर विश्वास है तो क्या बात है

आँखों से आँसू बह गए तो क्या बात है
बिन बोले बात कह गए तो क्या बात है
मुमकिन नहीं है बात हरेक बोल के कहना,
भावों के साथ रह गए तो क्या बात है

इन्सान बन के जी सके तो क्या बात है
मेहमान बन के पी सके तो क्या बात है
कपड़े की तरह जिन्दगी में आसमां फटे,
गर आसमान सी सके तो क्या बात है

जो जीतते हैं वोट से तो क्या बात है
जो चीखते हैं नोट से तो क्या बात है
जो राजनीति चल रही कि लुट गया सुमन,
जो सीखते हैं चोट से तो क्या बात है